खुद मैं अपनी ज़ुबाँ से आगे हूं-ग़ज़लें-ख़याल लद्दाखी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Khayal Ladakhi

खुद मैं अपनी ज़ुबाँ से आगे हूं-ग़ज़लें-ख़याल लद्दाखी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Khayal Ladakhi

खुद मैं अपनी ज़ुबाँ से आगे हूं
यानी हर इक बयाँ से आगे हूं

मेज़बां हूं क़ज़ा का अपनी मैं
आज फिर मेहमाँ से आगे हूं

लौट जाना है लाज़मी मुझ को
दो क़दम आशियाँ से आगे हूं

या तो मेरी है नासमझदारी
या तो मैं हर गुमाँ से आगे हूं

आप ख़न्जर बकफ़ सही लेकिन
मैं भी आह ओ फ़ुग़ाँ से आगे हूं

इक मुकम्मल क़फ़स में हूं गोया
ज़िक्र ए कोन ओ मकां से आगे हूं

मुझसे बढ़कर नहीं रहा कोई
अब मैं सारे जहां से आगे हूं

जब से मैं हूं ख़याल के हमराह
तब से गोया ज़माँ से आगे हूं

Leave a Reply