खिड़की बन्द कर दो-गीत-अगीत-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj 

खिड़की बन्द कर दो-गीत-अगीत-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

अब सही जाती नहीं यह निर्दयी बरसात-
खिड़की बन्द कर दो।

यह खड़ी बौछार, यह ठंडी हवाओं के झकोरे,
बादलों के हाथ में यह बिजलियों के हाथ गोरे
कह न दें फिर प्राण से कोई पुरानी बात-
खिड़की बन्द कर दो।

वो अकेलापन कि अपनी सांस लगती फाँस जैसी,
काँपती पीली शिखा दिखती दिये की लाश जैसी,
जान पड़ता है न होगा इस निशा का प्रात-
खिड़की बन्द कर दो।

था यही वह वक्त मेरे वक्ष में जब शिर छिपाकर,
था कहा तुमने तुम्हारी प्रीति है मेरी महावर,
बन गई कालिख तुम्हें पर अब वही सौगात-
खिड़की बन्द कर दो।

अब न तुम वह, अब न मैं वह, वे न मन में कामनायें,
आँसुओं में घुल गईं अनमोल सारी भावनायें,
किसलिए चाहूँ चढे फिर उम्र की बारात-
खिड़की बन्द कर दो।

रो न मेरे मन, न गीला आँसुओं से कर बिछौना,
हाथ मत फैला पकड़ने को लड़कपन का खिलौना,
मेंह-पानी में निभाता कौन किसका साथ-
खिड़की बन्द कर दो।

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