खाली घर- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

खाली घर- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

 

गोधूलि वेला में घर आता हूँ मैं

गोधूलि वेला में घर आता हूँ मैं
तब बन्द देखता हूँ द्वार।
खुले किवाड़ों के भीतर से अब
झाँकते-मँडराते अन्धकार के बीच टिमटिमाती
चमकीली दो तारिकाओं का समुत्सुक स्वागत…नहीं,
बन्द हैं द्वार।
मेरे ही हाथों कुण्डी पर लगाया गया ताला
नकारता है, शेष समय कहाँ बिताऊँ?
विश्व का मेला बिखर गया है बाहर,
दूर के दिगन्त में मद्धिम रव का शमन,
छा रही केवल शून्यता।
सकल विलुप्त स्वयं में ही निलय होता!

खोलता हूँ किवाड़।
(मुख खोलने से फूटती नहीं वाणी)
खोखला तिमिर,
मृत्यु की निविड़ मौन छाया में
भर रहा हूँ डग;
मैं नहीं, देखते हैं नेत्र, घूमता है सदेह मेरा प्रेत।

जलाता हूँ दीपक;
टाँड पर टिकी हुई पात्रों की परछाइयाँ
मुँह फेरकर करती हैं चिक चिक, गूढ हँसती हैं।
व्यतीत कंकाल का जाग रहा कोलाहल,
रुक जाती है हृदय की धड़कन,
पल सरकना भूल जाए!
सामने के आईने में जरा पड़ती है नजर :
कोई प्रतिबिम्ब नहीं,
केवल नि:सीम सन्नाटा
खाली घर।

पूरबी खिड़की से एक समय आयी हुईं वे चन्द्र की किरणें

पूरबी खिड़की से एक समय आयी हुईं वे चन्द्र की किरणें
पश्चिम के झरोखे हो आती हैं फिर एक बार।
अन्धकार में जो सकल होता लुप्त
उसकी उनींदी आँखों के सामने रख दे कतार।

न कोई आवाज,
आलोक और छाया-भस्म मलकर जैसे घूमे भूतदेह,
नीविबद्ध वासना का अपलक मौन श्वेत श्वेत!
हवा में
अंग में ठण्डक
गत अनागत
स्मृति स्वप्न का
न तनिक स्पर्श
जाग्रत
अंग को बिछाकर मानो पड़ा है सन्नाटा।
गतिमय
निखिल-निरति परिवार
एक अतीन्द्रिय सुन्नबिन्दु में
पाता रहता है विलय।

मकड़ी के जाल की अविचल बृहत् छाया

मकड़ी के जाल की अविचल बृहत् छाया
घेर रही है पूरी दीवार और छत।

शत शत पाश में बद्ध
छोर पर एक भरा हुआ जो दाग,
दूसरा कुछ नहीं, छायामय मैं ही, मैं ही।
अविचल में गतिशील उछलती मेरी भुजा :
नहीं कोई निरोध
जाल रहता है अटूट।

कहीं से वहाँ आता रे कबन्ध
अन्ध,
हर तारे पर गति से घूमे
आठों पैरों से मानों जकड़ रहा मुझे।
नहीं कोई दबाव,
नहीं दंश,
एक दूसरे में ओतप्रोत और फिर भी
अवकाश वहाँ अनन्त।
दक्षिण की खिड़की से बाहर छाया अन्तहीन
अन्धकार।
दीप नहीं, अ
ब नहीं भेद,
लयलीन सब;
केवल अभाव।
रुक जाए कालरात्रि में नाड़ी की मन्द धड़कन।
कुछ नहीं, नहीं।

लाख-लाख तारक अंगारभरी श्यामल शर्वरी

लाख-लाख तारक अंगारभरी श्यामल शर्वरी
जैसा मन।
झीनी-झीनी रोम-रोम ज्वाला
(कजलाई नहीं,
कहीं नहीं लिपटा है राख-आवरण)।
स्वयं ही दिखे एक इतना ही तेज,
नहीं ताप।
लाख-लाख तारक अंगार शीतल श्यामल शर्वरी!
अन्तहीन का यदि हो आकलन,
रखे सीमा।
अविच्छिन्न आँच यदि बनी रहे एक
तो यह रात्रि
सहस्र सूर्य की दीप्ति से शोभित रहे रे स्वयम्!
आकाश में अनदेखे हर ग्रह पर
उसके उष्मापूर्ण रंग की सुषमा बहती रहे;
अन्तहीन का यदि हो आकलन…

यहाँ तो सोया है शव
अचेतन गात
(अबाधित काल)
अंग अंग में खेल रहा स्पन्दन एक
ऐसा इनकार सम्पात-
(गति चाल)
के बिना शान्त
शान्त सोया यहाँ शव…

 

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