खादी के फूल -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 1

खादी के फूल -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 1

आज प्रार्थना से करते तृण तरु भर मर्मर

आज प्रार्थना से करते तृण तरु भर मर्मर,
सिमटा रहा चपल कूलों को निस्तल सागर!
नम्र नीलिमा में नीरव, नभ करता चिंतन
श्वास रोक कर ध्यान मग्न सा हुआ समीरण!

क्या क्षण भंगुर तन के हो जाने से ओझल
सूनेपन में समा गया यह सारा भूतल?
नाम रूप की सीमाओं से मोह मुक्त मन
या अरूप की ओर बढ़ाता स्वप्न के चरण?

ज्ञात नहीं : पर द्रवीभूत हो दुख का बादल
बरस रहा अब नव्य चेतना में हिम उज्वल,
बापू के आशीर्वाद सा ही : अंतस्तल
सहसा है भर गया सौम्य आभा से शीतल!

खादी के उज्वल जीवन सौंदर्य पर सरल
भावी के सतरँग सपने कँप उठते झलमल!

हाय, आँसुओं के आँचल से ढँक नत आनन

हाय, आँसुओं के आँचल से ढँक नत आनन
तू विषाद की शिला, बन गई आज अचेतन,
ओ गाँधी की धरे, नहीं क्या तू अकाय-व्रण?
कौन शस्त्र से भेद सका तेरा अछेद्य तन?

तू अमरों की जनी, मर्त्य भू में भी आकर
रही स्वर्ग से परिणीता, तप पूत निरंतर!
मंगल कलशों से तेरे वक्षोजों में घन
लहराता नित रहा चेतना का चिर यौवन!
कीर्ति स्तंभ से उठ तेरे कर अंबर पट पर
अंकित करते रहे अमिट ज्योतिर्मय अक्षर!

उठ, ओ गीता के अक्षय यौवन की प्रतिमा,
समा सकी कब धरा स्वर्ग में तेरी महिमा!
देख, और भी उच्च हुआ अब भाल हिम शिखर
बाँध रहा तेरे अंचल से भू को सागर!

हिम किरीटिनी, मौन आज तुम शीश झुकाए

हिम किरीटिनी, मौन आज तुम शीश झुकाए
सौ वसंत हों कोमल अंगों पर कुम्हलाए!
वह जो गौरव शृंग धरा का था स्वर्गोज्वल,
टूट गया वह?—हुआ अमरता से निज ओझल!
लो, जीवन सौंदर्य ज्वार पर आता गाँधी,
उसने फिर जन सागर से आभा पुल बाँधी!

खोलो, माँ, फिर बादल सी निज कबरी श्यामल,
जन मन के शिखरों पर चमके विद्युत के पल!
हृदय हार सुरधुनी तुम्हारी जीवन चंचल,
स्वर्ण श्रोणि पर शीश धरे सोया विंध्याचल!
गज रदनों से शुभ्र तुम्हारे जघनों में घन
प्राणों का उन्मादन जीवन करता नर्तन!

तुम अनंत यौवना धरा हो, स्वर्गाकांक्षित,
जन को जीवन शोभा दो : भू हो मनुजोचित!

देख रहे क्या देव, खड़े स्वर्गोच्च शिखर पर

देख रहे क्या देव, खड़े स्वर्गोच्च शिखर पर
लहराता नव भारत का जन जीवन सागर?
द्रवित हो रहा जाति मनस का अंधकार घन
नव मनुष्यता के प्रभात में स्वर्णिम चेतन!

मध्ययुगों का घृणित दाय हो रहा पराजित,
जाति द्वेष, विश्वास अंध, औदास्य अपरिमित!
सामाजिकता के प्रति जन हो रहे जागरित
अति वैयक्तिकता में खोए, मुंड विभाजित!

देव, तुम्हारी पुण्य स्मृति बन ज्योति जागरण
नव्य राष्ट्र का आज कर रही लौह संगठन!
नव जीवन का रुधिर हृदय में भरता स्पंदन,
नव्य चेतना के स्वप्नों से विस्मित लोचन!

भारत की नारी ऊषा भी आज अगुंठित,
भारत की मानवता नव आभा से मंडित!

देख रहा हूँ, शुभ्र चाँदनी का सा निर्झर

देख रहा हूँ, शुभ्र चाँदनी का सा निर्झर
गाँधी युग अवतरित हो रहा इस धरती पर!
विगत युगों के तोरण, गुंबद, मीनारों पर
नव प्रकाश की शोभा रेखा का जादू भर!

संजीवन पा जाग उठा फिर राष्ट्र का मरण,
छायाएँ सी आज चल रहीं भू पर चेतन,-
जन मन में जग, दीप शिखा के पग धर नूतन
भावी के नव स्वप्न धरा पर करते विचरण!

सत्य अहिंसा बन अंतर्राष्ट्रीय जागरण
मानवीय स्पर्शों से भरते हैं भू के व्रण!
झुका तड़ित-अणु के अश्वों को, कर आरोहण,
नव मानवता करती गाँधी का जय घोषण!

मानव के अंतरतम शुभ्र तुषार के शिखर
नव्य चेतना मंडित, स्वर्णिम उठे हैं निखर!

देव पुत्र था निश्वय वह जन मोहन मोहन

देव पुत्र था निश्वय वह जन मोहन मोहन,
सत्य चरण धर जो पवित्र कर गया धरा कण!
विचरण करते थे उसके सँग विविध युग वरद
राम, कृष्ण, चैतन्य, मसीहा, बुद्ध, मुहम्मद!

उसका जीवन मुक्त रहस्य कला का प्रांगण
उसका निश्छल हास्य स्वर्ग का था वातायन!
उसके उच्चादर्शों से दीपित अब जन मन,
उसका जीवन स्वप्न राष्ट्र का बना जागरण!

विश्व सभ्यता की कृत्रिमता से हो पीड़ित
वह जीवन सारल्य कर गया जन में जागृत!
यांत्रिकता के विषम भार से जर्जर भू पर
मानव का सौंदर्य प्रतिष्ठित कर देवोत्तर!

आत्म दान से लोक सत्य को दे नव जीवन
नव संस्कृति की शिला रख गया भूपर चेतन!

बारबार अंतिम प्रणाम करता तुमको मन

बारबार अंतिम प्रणाम करता तुमको मन
हे भारत की आत्मा, तुम कब थे भंगुर तन?
व्याप्त हो गए जन मन में तुम आज महात्मन्
नव प्रकाश बन, आलोकित कर नव जग-जीवन!
पार कर चुके थे निश्वय तुम जन्म औ’ निधन
इसीलिए बन सके आज तुम दिव्य जागरण!
श्रद्धानत अंतिम प्रणाम करता तुमको मन
हे भारत की आत्मा, नव जीवन के जीवन!

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