ख़ैर माँगी जो आशियाने की-ग़ज़लें-नौशाद अली(नौशाद लखनवी)-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naushad Ali

ख़ैर माँगी जो आशियाने की-ग़ज़लें-नौशाद अली(नौशाद लखनवी)-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naushad Ali

ख़ैर माँगी जो आशियाने की
आँधियाँ हँस पड़ीं ज़माने की

मेरे ग़म को समझ सका न कोई
मुझ को आदत है मुस्कुराने की

दिल सा घर ढा दिया तो किस मुँह से
बात करते हो घर बसाने की

हुस्न की बात इश्क़ के क़िस्से
बात करते हो किस ज़माने की

दिल ही क़ाबू में अब नहीं मेरा
ये क़यामत तिरी अदा ने की

कुछ तो तूफ़ाँ की ज़द में हम आए
कुछ नवाज़िश भी ना-ख़ुदा ने की

मुझ को तुम याद और भी आए
कोशिशें जितनी की भुलाने की

वो ही ‘नौशाद’ फ़न का शैदाई
बात करते हो किस दिवाने की

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