ख़ैबर की लड़ाई- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi 

ख़ैबर की लड़ाई- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

हो क्यूं न बुरा गम से ख़वारिज का दहाड़ा?
जड़ पेड़ से कुफ्र उनका न क्यूं जाये उखाड़ा?
घर तैश मुख़ालिफ़ का रहे क्यूं न उजाड़ा?
“ले नाम अली” जब कहूं ललकार जबाड़ा।
दरियाये फ़लक का भी दहल जाये कड़ाड़ा॥1॥

पहले तो पयम्बर से लड़ा था वह कड़क के।
रुस्तम के तई ठोंक ले, दे ज़ाल को धक्के।
छुट जायें वहां सामो नरीमान के छक्के।
हैं शाह की जु़रअत के जहां धूम धड़क्के।
नेजों के तई आन के मैदान में गाड़ा॥2॥

दुखती थी मेरे शाह की जब आंख सरासर।
पेश आया जभी मारिकए क़िलअए खैबर।
इस वास्ते घर छोड़ गये उनको पयम्बर।
और आप नबी लेके चले दीन का लश्कर।
झंडों के तई आन के मैदान में गाड़ा॥3॥

दिन रात मची आन के खै़बर की लड़ाई।
और फ़तह कई रोज़ तलक हाथ न आई।
ले नादेअली हक़ ने पयम्बर को भिजाई।
जिब्रील ने यह बात वहीं आन सुनाई।
यह गढ़ तो किसी तरह न जावेगा उखाड़ा॥4॥

और यूं ही बहुत रोज़ तलक तुम से लड़ेगा।
लश्कर पे लड़ाई का बड़ा बोझ पडे़गा।
पामाल न हो, ख़ाक में हरगिज न गड़ेगा।
जब तक न अली आन के इस गढ़ पे चढ़ेगा।
यह गढ़ तो उसी शाह से जावेगा उखाड़ा॥5॥

यह सुनते ही हज़रत ने मेरे शाह को बुलाया।
आये तो वहीं छाती से बस अपनी लगाया।
आंखों में लबेपाक लगाकर यह सुनाया।
इस फ़तह का है हुक्म तेरे नाम पे आया।
बेशक यह मकां तुम से ही जावेगा उखाड़ा॥6॥

यह सुनते ही हैदर ने, ज़र्राख़ोद पहनकर।
दुलदुल पर वे चढ़े कहके, जो अल्ला हो व अकबर।
आये वह वहां पर था जहां क़िलए खै़बर।
कावे को लगाकर दिया रहवार को चक्कर।
नेजे़ को हिलाया कभी तिरछा कभी आड़ा॥7॥
कहते हैं कि खै़बर है बड़े कोह के ऊपर।
गिर्द इसके धरा है वहां एक सख़्त सा पत्थर।
दुलदुल को फिरा शाह ने दरवाजे पे आकर।
हिम्मत कर उठा हाथ को मारा जो ज़मीं पर।
पत्थर में वही गड़ गया नेजा जूं ही गाड़ा॥8॥

जब आके हुए वां असदुल्लाह नुमाया।
तब चलने लगे तीरो तबर, खंजरो पैकां।
दरवाजे पे ख़ैबर के जो बैठा था निगहवां।
हैदर के ख़तो ख़ाल पे जब उसका गया ध्यान।
मुंह देख के काफ़िर नेवहीं शाह को ताड़ा॥9॥

चिल्ला के जभी उसने यह आवाज सुनाई।
क्या बैठा है कमबख़्त है शामत तेरी आई।
जो कुछ कि निशानी थी बुजुर्गों ने बताई।
सब इस असदुल्लाह में देती है दिखाई।
अब गढ़ तेरा जाता है इसी दम में उखाड़ा॥10॥

दस्ती है नजूमों की सफ़ेदी में सियाही।
जाते ही मकां लेवेगा यह शेरे इलाही।
यह तीर यह पैकान है हैदर की गवाही।
आई है तेरे कुफ्र, की कश्ती पे तबाही।
आया है वहीं शेर इलाही का निवाड़ा॥11॥

यह सुनते ही मरहब को ग़रज तैश चढ़ आया।
आवाज से हारिस को वहीं उसने बुलाया।
ले लश्करे कुफ़्फ़ार को बाहर निकल आया।
हैदर से चला लड़ने को वह देव का जाया।
तैयार किया लड़ने को कुश्ती का अखाड़ा॥12॥

सफ़ बांधे उधर लश्करे कुफ़्फ़ार खड़ा था।
और एक तरफ को था अलम फ़ौजे अली का।
और दोनों तरफ़ तेज़ तबल जंग का बाजा।
आवाज़ नक़ीबों ने वहीं ज़ोर की दी आ।
और जंग का मैदां में जमा आके अखाड़ा॥13॥

पहले तो हुई जंग अमूदो की नमूदार।
फिर उनकी कमन्दों का खुला हलक़ए खूंख़्वार।
फिर बर्क़ की सूरत से चमकने लगी तलवार।
शेरों से हुआ आन के मैदान नमूदार।
जूं राद के होता है गरजने में झंगाड़ा॥14॥

हर सिस्त से आते ही घटा छा गई घनघोर।
तीरों का बरसने लगा मेह आन के पुर ज़ोर।
शमशीर की बिजली भी चमकने लगी चहुं ओर।
ईधर से हुआ लश्करे इस्लाम का गुल शोर।
ऊधर से हर एक काफ़िरे बदकेश दहाड़ा॥15॥

मरहब ने अखाड़े में क़दम आके दिये गाड़।
हारिस भी उसी आन बना आन के एक ताड़।
ख़म ठोंक बदल त्योरी को बाजू के तई झाड़।
इस ज़ोर से नारा किया वां आन के चिंघाड़।
कोहक़ाफ़ के पर्दे में गोया देव चिंघाड़ा॥16॥

यूं कहने लगा लश्करे इस्लाम को ललकार।
आवे जो हो कोई तुम में पहलवान नमूदार।
तो हाथ मेरा देख ले और ज़ोर के आसार।
क्या ताब है मुझ से जो लड़े आन के एक बार।
मैंने तो सदा देव के सीने को है फाड़ा॥17॥

यह सुनते ही हैदर ने दी रख हाथ से समसाम।
और सीधे चले आये अखाड़े में उठा गाम।
कुम्बर ने लिया दौड़ के दुलदुल के तई थाम।
मरहब से लड़े लेके जब अल्लाह का वह नाम।
आपस में लगा होने को ज़ोरों का झड़ाड़ा॥18॥

मरहब तो वहीं गिर पड़ा यह देख के सामां।
सब पर हुए मौला के मेरे ज़ोर नुमायां।
उस काफ़िरे बदकेश के तब छुट गये औसां।
मौला ने उसे मार के ठोकर से उसी आं।
हारिस को कुचल कूट के, मरहब को पछाड़ा॥19॥

था उनमें ही एक और पहलवान ज़ोरआवर।
मरहब को उठाने लगा आकर वह ज़ोरआवर।
दुलदुल ने उसे देख के जल्दी से उछल कर।
एक लात जड़ी क़हर की दांतों से पकड़कर।
यूं चाब लिया जैसे चबाते हैं सिंघाड़ा॥20॥

हारिस को गिरा शाम को मरहब के तई मार।
मैदां में किये फ़तह के आसार नमूदार।
हमला किया ख़ैबर के ऊपर आन के एक बार।
घोड़े के ऊपर हैदरी नारे के तई मार।
पाताल की जड़ से दरे खै़बर को उखाड़ा॥23॥

थीं शाह की जुरअत की जहां तक कि तरंगें।
सब कांप गई क़िलए खै़बर की उलगें।
कितने तो वहां भाग गए मार शलगें।
और कितने गए भूल वहां आन के जंगें,
हर गबु को फिर तप से चढ़ा आन के जाड़ा॥22॥

तब उनपे चली आन के इस्लाम की तलवार।
भागा कोई जख़्मी, कोई बिस्मिल कोई खूंबार।
ढूढे न मिला फिर किसी बदकेश का आसार।
सब दूर हुए गुलशने दुनिया से ख़सो ख़ार।
और कुफ्ऱ के जंगल पे बजा दीं का कुल्हाड़ा॥23॥

की फतह ग़रज शाह ने खैबर की लड़ाई।
बदकेशों की पल मारते ही कर दी सफ़ाई।
कुफ़्फ़ार में इस्लाम की नौबत को बजाई।
खै़बर में फिरी आन के हैदर की दुहाई।
सब उड़ गया फिर आन के कुफ़्फ़ार का घाड़ा॥24॥

मैं मदह ‘नज़ीर’ अब जो बनाता हूं हमेशा।
दौलत ही का इनआम मैं पाता हूं हमेशा।
खाता हूं, खिलाता हूं लुटाता हूं हमेशा।
खै़रात उसी दर से मैं पाता हूं हमेशा।
जारी है सदा मेरे शहंशाह का बाड़ा॥25॥
जारी है सदा मेरे शहंशाह का बाड़ा॥25॥

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