ख़ुदा की तारीफ़- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi 

ख़ुदा की तारीफ़- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

ख़ुदा की ज़ात है वह जुलजलाल वल इकराम।
कि जिससे होते हैं परवर्दा सब ख़वासो अवाम।
उसी ने अर्ज़ो समावात को दिया है निज़ाम।
उसी की जात को है दायमो सबातो क़याम॥
क़दीर वहदो करीमो मुहीमिनो अनआम॥1॥

फ़लक पै तारों की क्या क्या मुरस्सा कारी की।
फिर उनमें जे़बफ़िजा कहकशां निगारी की।
ज़ियाओ-नूर की क्या क्या तजल्ली बारी की।
बुरूज बारह में लाकर रखी वह बारीकी।
कि जिसको पहुंचे न फ़िकरत न दानिशो औहाम॥2॥

बनाई कुर्सियो अर्श और ला मकां दर आं।
फिर और सदरए रफ़रफ़ से दर्ज नारो जिना।
तहूरो हूरो क़ुसूरो मलायको रिज़वां।
इधर फ़रिश्तए कबी और हैं उधर गुलमां।
कलम की लौह पै बख्शी है ताक़ते अरक़ाम॥3॥

सवाबित उसने बनाये हैं इस क़दर सैयार।
कि रोजे़ हण्र तलक हो सके न जिनका शुमार।
मगर यह नाम है उनके जो सात हैं सैय्यार।
यह दो हैं शम्सो क़मर, और साथ उनके यार।
अतारु ओ-जहलो, ज़ोहरा, मुश्तरी बहराम॥4॥

हुआ है हुक्म अज़ल से जो उनको फिरने का।
करेंगे दौर यह हमराह आस्मां के सदा।
क़वी किसी का कहां हुक्म हो सके ऐसा।
जो चाहें एक पलक ठहरें यह, सो ताक़त क्या।
फिरा करेंगे यह आग़ाज से ले ता अनजाम॥5॥

जो कुछ है उसने बनाया यह कुल निहानी अयां।
उसी की सनअतो कु़दरत के हैं यह सब शायां।
हैं ऐसे ऐसे मकां और उसके बेपायां।
बशर जो चाहे सो समझे उन्हें है क्या इमक़ां।
है यां फ़रिश्तों की आजिज़ उकू़ल और अफ़हाम॥6॥

जमीं को देखो तो कुल आब पर दिया है क़रार।
फिर उसमें और बनये हैं कोहो बर्रो बहार।
किया है और नबातात के तईं इजहार।
निकाले उनसे गुलो मेवा शाख़ गुल और बार।
सब उसके लुत्फ़ो करम के हैं आम यह इनआम॥7॥

उसी के हुक्म से हम इस जहां में आते हैं।
जुबानो, अक़्लो खि़रद चश्मो गोश पाते हैं।
उसी के तुल्फ़ से फूले नहीं समाते हैं।
उसी के बाग़ से दिलशाद होके खाते हैं।
छुहारे व किशमिशी इनजीरो पिस्तओ बादाम॥8॥

वही है ख़ालिक़ो राज़िक वही रऊफ़ो गफू़र।
उसी के मेहर से पलते हैं इन्सां वहशो तयूर।
उसी के हुक्म से ख़लक़त का यां हुआ है ज़हूर।
चमक रहा है उसी की यह कु़दरती का नूर।
बहर ज़मानो बहर साअतो बहर हंगाम॥9॥

उसी ने हुक्म किया है हमें इबादत का।
उसी ने ताअतो तक़वा का हुक्म हमको दिया।
जो ग़ौर की तो हमारा भी है इसी में भला।
कि उसका शुक्र करें शब से ता बरोज अदा।
इताअत उसकी बज़ा लावें सुबह से ता शाम॥10॥

जो उसमें लुत्फो इनायत है कब-किसी में हो।
हर इक तरफ़ है उसी के गुले करम की बू।
इबादत उसकी है जो हो वेदिल की खू़।
‘नज़ीर’ नुक्ता समझ मेहरो फ़ज़्ल ख़ालिक को।
उसी के फ़ज़्ल से दोनों जहां में है आराम॥11॥

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