ख़ुदा-ए-बरतर-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

ख़ुदा-ए-बरतर-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

ख़ुदा-ए-बरतर
मिरी महब्बत
तिरी महब्बत की रिफ़अतों से अज़ीमतर है
तिरी महब्बत का दरख़ूरे-एतना
फ़क़त बेकराँ मुंदर
कि जिसकी ख़ातिर
सदा तिरी रहमतों के बादल
कभी किसी आबशार की नग़्मगी के मोती
कभी किसी आबजू के आँसू
कभी किसी झील के सितारे
कहीं से शबनम, कहीं से चश्मे, कहीं से दरिया उड़ा के लाए
कि तिरे महबूब को जलालो-जमाल बख़्शें
तिरी महब्बत तो उस शहनशाह की तरह है
जो दूसरों के हुनर से, ख़ूने-जिगर से
अपनी वफ़ा को दवाम बख़्शे
मगर मिरी बे-बिसात चाहत
फ़क़त मिरे आँसुओं से
मेरे लहू से… मेरी ही आबरू से
रही है ज़िंदा
अगर्चे उस बेबज़ाअती ने
मुझे हमेशा शिकस्त दी है
मगर ये नाकामी-ए-तमन्ना भी
इस महब्बत से कामराँतर, अज़ीमतर है
जो अपनी सित्वत के बल पर
औरों की आहो-ज़ारी से
अपने जज़्ब-ए-वफ़ा की तश्हीर चाहती है
मेरी मुहब्बत ने
जो भी नाम-ए-हबीब
से कर दिया मानून
वो हर्फ़ मेरा है, मेरा अपना है
ऐ ख़ुदा-ए-बुज़ुर्गो-बरतर !

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