ख़ुदनुमा होके निहाँ छुप के नुमायाँ होना-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

ख़ुदनुमा होके निहाँ छुप के नुमायाँ होना-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

ख़ुदनुमा होके निहाँ छुप के नुमायाँ होना
अलग़रज़ हुस्न को रूसवा किसी उनवाँ होना

यूँ तो अकसीर है ख़ाके-दरे-जानाँ
लेकिन काविशे-ग़म से उसे गर्दिशे-दौराँ होना

हद्दे-तमकीं से न बाहर हुई खु़द्दार
निगाह आज तक आ न सका हुस्ने को हैराँ होना

चारागर दर्द सरापा हूँ मेरे दर्द
नहीं बावर आया तुझे नश्तनर का रगे-जाँ होना

दफ़्तरे-राज़े-महब्बहत था मलाले-दिल
पर वो सुकूते निगहे-नाज़ का पुरसाँ होना

सर-बसर बर्के़-फ़ना इश्क़ के जलवे हैं ‘फ़िराक़’
खा़नए-दिल को न आबाद न वीराँ होना

 

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