ख़त बढ़ा काकुल बढ़े ज़ुल्फ़ें बढ़ीं गेसू बढ़े-ज़ौक़ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Zauq 

ख़त बढ़ा काकुल बढ़े ज़ुल्फ़ें बढ़ीं गेसू बढ़े-ज़ौक़ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Zauq

ख़त बढ़ा काकुल बढ़े ज़ुल्फ़ें बढ़ीं गेसू बढ़े
हुस्न की सरकार में जितने बढ़े हिन्दू बढ़े

बा’द रंजिश के गले मिलते हुए रुकता है जी
अब मुनासिब है यही कुछ मैं बढ़ूँ कुछ तू बढ़े

बढ़ते बढ़ते बढ़ गई वहशत वगर्ना पहले तो
हाथ के नाख़ुन बढ़े सर के हमारे मू बढ़े

तुझ को दुश्मन वाँ शरारत से जो भड़काते है रोज़
चाहते हैं और शर ऐ शोख़-ए-आतिश-ख़ू बढ़े

कुछ तप-ए-ग़म को घटा क्या फ़ाएदा इस से तबीब
रोज़ नुस्ख़े में अगर ख़ुर्फ़ा घटे काहू बढ़े

पेशवाई को ग़म-ए-जानाँ की चश्म-ए-दिल से ‘ज़ौक़’
जब बढ़े नाले तो उस से बेशतर आँसू बढ़े

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