ख़त-कविता-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

ख़त-कविता-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

“क़ासिद” सनम ने ख़त को मेरे देख क्या कहा?
हर्फ़े इताब, या सुखुने दिल कुशा कहा?
तुझको क़सम है, कीज़ो न पोशीदा मुझसे तू।
कहियो वही जो उसने मुझे बरमला कहा।
क़ासिद ने जब तो सुनके कहा “क्या कहूं मैं यार”।
पहले मुझी को उसने बहुत नासज़ा कहा।
फिर तुझको सौ इताब से झुझंला के दम ब दम।
क्या क्या कहूं मैं तुझसे कि क्या क्या बुरा कहा।
इसका मज़ा चखाऊंगा जाकर उसे शिताब।
रह रह इसी सुख़न के तई बारहा कहा।
मेरी तो कुछ खता नहीं तू ही समझ इसे।
बेजा कहा यह उसने मुझे या बजा कहा।
कहता था मैं तुझे कि न भेज उसको ख़त मियां।
लेकिन “नज़ीर” तूने न माना मेरा कहा॥

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