क्षत्रिय-भारत-भारती (भविष्यत् खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Bhavishyat Khand)

क्षत्रिय-भारत-भारती (भविष्यत् खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Bhavishyat Khand)

 

क्षत्रिय

हे क्षत्रियो ! सोचो तनिक, तुम आज कैसे हो रहे;
हम क्या कहें, कह दो तुम्हीं, तुम आज जैसे हो रहे ।
स्वाधीनता सारी तुम्हीं ने है न खोई देश की ?
बन कर विलासी, विग्रही नैया डुबोई देश की !॥ ७६ ॥

निज दुर्दशा पर आज भी क्यों ध्यान तुम देते नहीं ?
अत्यन्त ऊँचे से गिरे हा ! किन्तु तुम चेते नहीं !
अब भी न आँखें खोल कर क्या तुम बिलोकोगे कहो ?
अब भी कुपथ की ओर से मन को न रोकोगे कहो ?॥७७ ॥

वीरो ! उठो, अब तो कुयश की कालिमा को मेट दो,
निज देश को जीवन सहित तन, मन तथा धन भेट दो।
रघु, राम, भीष्म तथा युधिष्ठिर-सम न हो जो ओज से-
तो वीर विक्रम-से बनो, विद्यानुरागी भोज-से॥७८ ॥

 

वैश्य

वैश्यो ! सुना, व्यापार सारा मिट चुका है देश का,
सब धन विदेशी हर रहे हैं, पार है क्या क्लेश का ?
अब भी न यदि कर्तव्य का पालन करोगे तुम यहाँ-
तो पास हैं वे दिन कि जब भूखों मरोगे तुम यहाँ !॥७९॥

अब तो उठो, हे बन्धुओ ! निज देश की जय बोल दो;
बनने लगें सब वस्तुएँ, कल-कारखाने खोल दो।
जावे यहाँ से और कच्चा माल अब बाहर नहीं-
हो ‘मेडइन’ के बाद बस अब ‘इंडिया’ ही सब कहीं॥ ८०॥

है आज भी रत्न-प्रसू वसुधा यहाँ की-सी कहाँ ?
पर लाभ उससे अब उठाते हैं विदेशी ही यहाँ!
उद्योग घर में भी अहो ! हमसे किया जाता नहीं,
हम छाल-छिलके चूसते हैं, रस पिया जाता नहीं !!॥८१॥

 

शूद्र

शूद्रो ! उठो, तुम मी कि मारत-भूमि डूबी जा रही,
है योगियों को भी अगम जो व्रत तुम्हारा है वही।
जो मातृ-सेवक हो वही सुत श्रेष्ठ जाता है गिना,
कोई बड़ा बनता नहीं लघु और नम्र हुए विना ॥८२॥

रक्खो न व्यर्थ घृणा कभी निज वर्ण से या नाम से,
मत नीच समझो आपको, ऊँचे बनो कुछ काम से ।
उत्पन्न हो तुम प्रभु-पदों से जो सभी को ध्येय हैं,
तुम हो सहोदर सुरसरी के चरित जिसके गेय हैं ॥८३॥

 

साधु-सन्त

सन्तो ! महन्तो ! स्वामियो ! गौरव तुम्हारा ज्ञान है,
पर क्या कभी इस बात पर जाता तुम्हारा ध्यान है ?
यह वेश चाहे सुगम हो, आवेश अति दुर्गम्य है।
सौरभ-रहित है जो सुमन वह रूप में क्या रम्य है ॥८४॥

हे साधुओ ! सोये बहुत अब ईश्वराराधन करो,
उपदेश-द्वारा देश का कल्याण कुछ साधन करो।
डूबे रहोगे और कब तक हाय ! तुम अज्ञान में ?
चाहो तुम्हीं तो देश की काया पलट दो आन में ॥ ८५ ॥

थे साधु तुलसीदास, नानक, रामदास समर्थ मी,
व्यवहृत यही पद हो रहा है आज उनके अर्थ भी।
पर वे न होकर भी यहाँ उपकार सबका कर रहे,
सद्भाव उनके ग्रन्थ सबके मानसों में भर रहे ॥८६॥

कुछ वेश की भी लाज रक्खो, अज्ञता का अन्त हो;
भर कर न केवल उदर ही तुम लोग सच्चे सन्त हो।
बाधा मिटा दो शीघ्र मन से इन्द्रियों के रोग की,
फैले चमत्कृति फिर यहाँ पर सिद्धि-मूलक योग की ॥८७॥

 

तीर्थगुरु

हे तीर्थगुरुओ ! सोच लो, कैसा तुम्हारा नाम है,
यजमान का उद्धार करना ही तुम्हारा काम है ।
पर आज आत्म-सुधार के भी दीखते लक्षण कहाँ ?
चेतो, उठो, फिर तुम हमारे कर्णधार बनो यहाँ ॥८८||

 

शिक्षित

हे शिक्षितो ! कुछ कर दिखाओ, ज्ञान का फल है यही,
हो दूसरों को लाभ जिससे श्रेष्ठ विद्या है वही।
संख्या तुम्हारी अल्प है, उसको बढ़ाओ शीघ्र ही,
नीचे पड़े हैं जो उन्हें ऊपर चढ़ाओ शीघ्र ही ॥८९॥

अपने अशिक्षित भाइयों का प्रेमपूर्वक हित करो –
उनकी समुन्नति से उन्हें उत्साह-युत परिचित करो।
झानानुभव से तुम न निज साहित्य को वञ्चित करो-
पाओ जहाँ जो बात अच्छी शीघ्र ही सश्चित करो ॥९०॥

 

नेता

हे देशनेताओ ! तुम्हीं पर सब हमारा भार है-
जीते तुम्हारे जीत है, हारे तुम्हारे हार है।
निःस्वार्थ, निर्भय भाव से निज नीति पर निश्चल रहो,
“राष्ट्रेवयं जागृयाम पुरोहिताः स्वाहा” कहो ॥९१॥

 

कवि

करते रहोगे पिष्ट-पोषण और कब तक कविवरो!
कच, कुच, कटाक्षों पर अहो ! अब तो न जीते जी मरो।
है बन चुका शुचि अशुचि अब तो कुरुचि को छोड़ो भला,
अब तो दया कर के सुरुचि का तुम न यों घोंटो गला ॥९२॥

आनन्ददात्री शिक्षिका है सिद्ध कविता कामिनी,
है जन्म से ही वह यहाँ श्रीराम की अनुगामिनी ।
पर अब तुम्हारे हाथ से वह कामिनी ही रह गई,
ज्योत्स्ना गई देखो, अंधेरी यामिनी ही रह गई !॥ ९३॥

अब तो विषय की ओर से मन की सुरति का फेर दो,
जिस ओर गति हो समय की उस ओर मति को फेर दो।
गाया बहुत कुछ राग तुमने योग और वियोग का,
सञ्चार कर दो अब यहाँ उत्साह का उद्योग का ॥ ९४ ॥

केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए,
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।
क्यों आज “रामचरित्रमानस” सब कहीं सम्मान्य है?
सत्काव्य-युत उसमें परम आदर्श का प्राधान्य है॥९५॥

धैर्यच्युतों को धैर्य से कवि ही मिलाना जानते,
वे ही नितान्त पराजितों को जय दिलाना जानते ।
होते न पृथ्वीराज तो रहते प्रताप व्रती कहाँ ?
एथेन्स कैसे जीतता होता न यदि सोलन वहाँ ? ॥९६॥

संसार में कविता अनेकों क्रान्तियाँ है कर चुकी,
मुरझे मनों में वेग की विद्युत्प्रभाएँ भर चुकी।
है अन्ध-सा अन्तर्जगत कवि-रूप सविता के विना,
सद्भाव जीवित रह नहीं सकते सु-कविता के विना ॥९७ ॥

मृत जाति को कवि ही जिलाते रस-सुधा के योग से,
पर मारते हो तुम हमें उलटे विषय के रोग से !
कवियो ! उठो, अब तो अहो ! कवि-कर्म्म की रक्षा करो,
बस नीच भावों का हरण कर उच्च भावों को भरो॥९८॥

नवयुवक

हे नवयुवाओ ! देश भर की दृष्टि तुम पर ही लगी,
है मनुज जीवन की तुम्हीं में ज्योति सब से जगमगी।
दोगे न तुम तो कौन देगा योग देशोद्धार में ?
देखो कहाँ क्या हो रहा है आज कल संसार में ॥९९॥

जो कुछ पढ़ो तुम कार्य में भी साथ ही परिणत करो,
सब भक्तवर प्रह्लाद की निम्नोक्ति को मन में धरो-
“कौमार में ही भागवत धर्माचरण कर लो यहाँ,
नर-जन्म दुर्लभ और वह भी अधिक रहता है कहाँ” ॥१००॥

दो पथ, असंयम और संयम हैं तुम्हें अब सब कहीं,
पहला अशुभ है, दूसरा शुभ है, इसे भूलो नहीं।
पर मन प्रथम की ओर ही तुमको झुकावेगा अभी,
यदि तुम न सँभलोगे अभी तो फिर न सँभलोगे कभी ॥१०१॥

 

Leave a Reply