क्या अजीब नेचर पाया है-सतरंगे पंखोंवाली -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

क्या अजीब नेचर पाया है-सतरंगे पंखोंवाली -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

कदम-कदम पर मुसकाती है
बात-बात पर हँस देती है
दिल का दर्द कभी नहीं जाहिर करती है
सच वतलाना, कभी उसास नहीं भरती है ?
मुझको तो लगता है, तूने बहुत-बहुत-सा जहर पिया है
धीरे-धीरे सारा ही विष पचा लिया है
शोधित विष का सुधा-तुल्य यह झाग जब कभी
उफन-उफनकर बाहर आता
दुनिया को लगता है : रे, रे ! परजाते के फूल झर रहे
इस लड़की के होठों से तो…
क्या अजीब नेचर पाया है…
पग-पग पर यूं ढेर-ढेर-सा हँस देती है…

खुली एक दिन, मुझसे बोली :
बाबा, पिछले छै वर्षों से गूंगी हूँ मैं
मिला न कोई
मिला न कोई
जिसके आगे अपने दिल की बातें रखती
परिचित हैं यूँ तो बहुतेरे
बोल-चाल या हँसी-खुशी के अवसर आते ही रहते हैं
फिर भी मैं गूंगी हूं बाबा !
कभी-कभी तो लगता है,
इस दिल-दिमाग को कहीं न लकबा मार गया हो !
पागलखाने में भर्ती हो जाऊँ बाबा ?

यह सब सुनकर मैंने उसको
मीठी-सी फटकार बताई
और कहा–आ, ओ री बौड़म,
चलें अपन मद्रासी होटल, गरम-गरम काफी पी आएं !
गालों पर पड़ गईं प्यार की दो चपतें तो
लगा दिया छत-फाड़ ठहाका !
क्या अजीब नेचर पाया है !
कैसी अद्भुत है यह लड़की !!

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