कौवे और हिरन की दोस्ती-कविता पशु पक्षियों पर-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

कौवे और हिरन की दोस्ती-कविता पशु पक्षियों पर-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

एक दस्त में सुना है एक खू़ब था हिरन।
बच्चा ही था अभी न हुआ था बड़ा हिरन॥
फिरता था चौकड़ी का दिखाता मज़ा हिरन।
देखा जो एक कौवे ने वह खु़शनुमा हिरन॥
दिल को निहायत उसके वह अच्छा लगा हिरन॥1॥

दो बातें करके कौवे ने उसका लगा लिया।
दम में हिरन भी कौवे की उल्फ़त में आ गया॥
कौवे हिरन में ठहरी जो गहरी मुहब्बत आ।
कौवा जिधर जिधर को खु़शी होके जाता था॥
फिरता था उसके साथ लगा जा बजा हिरन॥2॥

एक गीदड़ उस हिरन के कने आके नाबकार।
बोला हज़ार जान से मैं तुम पै हूं निसार॥
मुझको भी अपना जान गुलाम और दोस्तदार।
और दिल में यह कि कीजे किसी तौर से शिकार॥
उसकी दग़ाओमक्र से वाक़िफ़ न था हिरन॥3॥

गीदड़ यह कहके मक्र से जिस दम गया उधर।
कौवा हिरन से कहने लगा करके शीरो शर॥
यह सख़्त मक्र बाज़ है कर इस से तू हिज़र।
एक दिन दग़ा से तुझको यह पकड़ेगा फ़ितनागर॥
सुनकर यह बात कौवे की चुप हो रहा हिरन॥4॥

दिन दूसरे हिरन कने गीदड़ फिर आ गया।
कौवे को सोता देख यह बोला वह पुरदग़ा॥
मैं आज देख आया हूं, क्या खेत एक हरा।
तुम आओ उसको चरके तो हो शाद दिल मेरा॥
सुनते ही उसके साथ उछलता चला हिरन॥5॥

जिस खेत पर यह लेके गया उसको बदसगाल।
वां पहले देख आया था वह एक हिरन का जाल॥
ले पहुंचा जब हिरन के तईं खेत पर शृगाल।
जाते ही वां हिरन ने दिया मुंह को उसमें डाल॥
मुंह डालते ही जाल में वां फंस गया हिरन॥6॥

यह फड़फड़ता आ गया कौवा भी नागहां।
गीदड़ को दे के गाली हिरन से कहा कि हां॥
तड़पै मत इसमें वर्ना तू होवे गा नातवां।
कौवे की बात सुनते ही हिम्मत को बांध वां॥
जैसे गिरा पड़ा था वहीं फिर उठा हिरन॥7॥

गीदड़ लगा जब आने हिरन की तरफ़ झपट।
कौआ पुकारा मार तू सींग एक जो जावे हट॥
या एक खुरी तू ऐसी लगा पांव की झपट।
जावे जो उसके लगते ही गीदड़ का पेट फट॥
सुनकर खड़े हो सींग हिलाने लगा हिरन॥8॥

गीदड़ ने खू़ब कौए को दीं जल के गालियां।
सय्याद वां हुआ था किसी सिम्त को रवाँ॥
इसमें शिकारी आके हुआ दूर से अयां।
कौआ पुकारा लेट जा दम बंद करके हां॥
दम बंद करके अपना वहीं गिर पड़ा हिरन॥9॥

गीदड़ ने उसको देख के एक जाके झाड़ी ली।
सय्याद उस हिरन को पड़ा देख उस घड़ी॥
अफ़सोस करके दाम की रस्सी खोल दी।
कौआ पुकारा भाग, अरे वक़्त है यही॥
सुनते ही वां से चौकड़ी भर कर उड़ा हिरन॥10॥

सय्याद ने जो देखा हिरन उठ चला झपाक।
जल्दी से दौड़ा पीछे हिरन के वह सीना चाक॥
सोटे को फेंक मारा जो फ़र्ती से उसने ताक।
भागा हिरन लगा वों ही गीदड़ के आ खटाक॥
सर इसका फूटा और वह सलामत गया हिरन॥11॥

गीदड़ ने उस हिरन का जो चीता था वां बुरा।
पाई उसी से अपनी बदी की वहीं सजा॥
था यह तो नस्र मैंने इसे नज़्म में किया।
पहुंचा ‘नज़ीर’ जब वह खु़शी होके अपनी जा॥
कौवे के साथ फिर वह बहुत खु़श रहा हिरन॥12॥

 

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