कौम ईंटों से तामीर नहीं होती- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

कौम ईंटों से तामीर नहीं होती- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

कौम ईंटों से तामीर नहीं होती-
कौम को दौलत भी दरकार नहीं
बाग़, पुल, महल, तालाब और मुहल्ले
किले- बेशक कौम का सरमाया हैं
ख़ुशहाली के लिये लाज़िम है सख़त मेहनत भी
हिफ़ाजत के वास्ते फ़ौज भी ज़रूरी है
जवां-मर्द इन्सान भी चाहिएं
इलम, हुनर, कमाल, दोसती भी दरकार है
पर दामन में सच्च अगर नहीं आपके
कुर्बानी के लिये तड़प नहीं दिल में
तो बेकार हैं आपकी सारी काविशें

कौम ईंटों से तामीर नहीं होती-
कौम तामीर होती है कुर्बानियों से
जो गुरू अर्जन ने बताया हमें
यहां से शुरू होता है शहादतों का सिलसिला
जिसे रौशन किया था पीरान-ए-पीर नानक ने
जिनके दम से वतन पारस बना
आयो मिलकर दुया करें
अता हो फिर से वह तौफ़ीक हमें
हम कुर्बानियों के जाम पीते रहें
और सर उठाकर शान से जीते रहें

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