कौन?-पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

कौन?-पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

अरुण मुख रवि सुषमा अवलोक।
रँगीली ऊषा से ले प्यार।
कान्त कुसुमाकर से कर लाभ।
परम कमनीय कुसुम का हार।1।

मिल गये मंजु समय का अंक।
अति सरस सुन्दर दिवस विलोक।
चल पड़े मादक मलय समीर।
हो गये बहु सुरभित सब ओक।2।

विपुल पुलकित दृग द्वारा देख।
हरिततम तरु नूतन परिधान।
सुविकसित सुमन पुंज के व्याज।
निरखकर प्रकृति वधू मुसकान।3।

आम की मंजरियों को चूम।
मोल लेकर मानस उन्माद।
सुन चपल चंचरीक गुंजार।
कान कर कोकिल कुल कलनाद।4।

लोक उर में भर बहु उत्साह।
बहा जन रग रग में रसधार।
विपुल कंठों को कर मधु दान।
छेड़ बहु मानस तंत्री तार।5।

गगन को आरंजित कर भूरि।
अवनि पर रक्तिम चादर डाल।
उड़ाकर बारंबार अबीर।
दिग्वधू का कपोल कर लाल।6।

पहुँच सेमल पलास के पास।
रंग पूरित पिचकारी मार।
अनारों कचनारों पर रीझ।
फेंक कर के कुमकुमे अपार।7।

रंग में डूबी गाती गीत।
मत्त हो चलती लटपट चाल।
कौन आती है भरी उमंग।
मंजु मुखड़े पर मले गुलाल।8।

This Post Has One Comment

Leave a Reply