कोणार्क की देहरी पर-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey 

कोणार्क की देहरी पर-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey

 

यहाँ शून्य का बोझ है मानो महाक्षय के कारण
धरती से समुद्र तक अंधेरा हो विश्व भर के हृदय में
रंगहीन ग्लानि ने सत्ता को ही दबोच लिया हो
मानो मानव की वाणी गळा घुट जाने से मर गयी हो।

यहाँ सभी कुछ शून्य है अन्धकार बेछोर
आनन्द का आत्मदान प्रेम, मैत्री, प्रीति
शिल्प का निर्माण अथवा कर्म की आरती
जीवन में जो कुछ भी पवित्र है विश्वस्त है वास्तव है
सब कुछ क्षय से नष्ट हो कर शून्य के गर्भ में न-कुछ हो गया है।

कहाँ है आरती, स्तुति ? डरावना अकेलापन !
सारे निर्माण के अन्त में ऐसा स्तब्ध नृत्यगान ।
जीवन के आखिरी छोर पर विपुल वैभव
भंगुर गलित शव है पुरातत्त्व का निर्वाण है।

तथापि बाहर सूर्य है बादल है बिजली है वर्षा है
पूर्णिमा और अमावस्या है चंचल पवन है
बाहर हजारों मूर्तियाँ प्राणों के रंग से सुसज्जित हैं
बाँसुरी, करताल, तूर्य खोल और पखावज लिये।
बाहर जीवन प्रस्तर की सत्ता में सांसें ले रहा है
कर्म की स्फूर्ति में प्राणों का प्रत्यय मांग रहा है ।

लेकिन भीतर कुछ भी नहीं है मृत्यु भी बिला गयी है।
जीर्ण-शीर्ण देहरी की इस असूर्यम्पश्या
वेदी के निर्जीव गर्भ में मन प्राण स्तब्ध हैं।
लगता है जीवन बाहर है जन्म मृत्यु कर्म में
आनन्द में आघात में स्वधर्म में मैं जीवन खोजता हूँ।

इस का मृत जीवन अपनी प्रतिष्ठा से धीरे-धीरे
शून्य के बोझ को कल बाहर से मिला देगा।
जानता हूँ कल शून्य का यह गर्त कट जायेगा
फिर से चैतन्य का प्रत्यक्ष प्रसाद मिलेगा।

आज यह अन्धकार मर्म में डेरा डाले पड़ा है
शून्य का ऐसा भार ! शिल्प को धिक्कार है,
प्रेम नहीं मृत्यु नहीं शून्य का यह उद्भ्रान्त
देशव्यापी अन्धकार किस का प्रतिवाद है ?

 

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