कोठा-1-कविता-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

कोठा-1-कविता-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

रहे जो शब को हम उस गुल के साथ कोठे पर।
तो क्या बहार से गुज़री है रात कोठे पर॥
यह धूमधाम रही सुबह तक अहा हा हा।
किसी की उतरे है जैसे बरात कोठे पर॥
मकां जो ऐश का हाथ आया गै़र से खाली।
पटे के चलने लगे फिर तो हाथ कोठे पर॥
गिराया शोर किया गालियां दी धूम मची।
अ़जब तरह की हुई बारदात कोठे पर॥
लिखें हम ऐश की तख़्ती को किस तरह ऐ जां।
क़लम ज़मीन के ऊपर, दवात कोठे पर॥
कमद जुल्फ़ की लटका के दिल को ले लीजे।
यह जिन्स यूं नहीं आने की हाथ कोठे पर॥
खु़दा के वास्ते जीने की राह बतलाओ।
हमें भी कहनी है कुछ तुम से बात कोठे पर॥
लिपट के सोये जो उस गुलबदन के साथ “नज़ीर”।
तमाम हो गईं हल मुश्किलात कोठे पर॥

 

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