कोई सुर का सवार- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

कोई सुर का सवार- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

 

कोई सुर का सवार
आके उतरा अरव मेरे उर के दुआर
कोई सुर का सवार।

उसके अंगों से माटी की गन्ध महके रे
नयनों में तेज का रंग
पानी के झरने किल्लोलते क्या
उसकी उछले उमंग
उसकी उछले उमंग;
मेरी सूनी मन्दिरिया में हो रे संचार

वह तो अनदेखी भूमि दिखलाये रे
भाखे अगम के बोल,
खाली दिन ज्यों साँझ का
चढ़े झोंकों हिंडोल,
चढ़े झोंकों हिंडोल;
मेरी जोत रे प्रगटी उसका तेज है अपार।

मेरे पग में नूपुर, कान में लोर
सजा फूलों कलेवर
सपनों के सुख से ही आज की
आधी रात है सुन्दर
आधी रात है सुन्दर;
कोई परसे जन्तर मेरा झरे झंकार।
कोई सुर का सवार।

रूपान्तर : सुल्तान अहमद

 

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