कोई दरख़्त मिले या किसी का घर आये-गीतिका-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

कोई दरख़्त मिले या किसी का घर आये-गीतिका-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

कोई दरख़्त मिले या किसी का घर आये
मैं थक गया हूँ कहीँ छाँव अब नज़र आये।

जिधर की सिम्त मेरे दोस्ती की बैठक थी,
उसी तरफ़ से मेरे सेहन में पत्थर आये।

दिलों को तोड़ के मन्दिर जो बनाकर लौटे
उन्हें बताओ कि वह क्या गुनाह कर आये।

न जाने फूल महकते हैं किस तरह के वहाँ
जो तेरी सिम्त गये, लौटकर न घर आये।

वो क़त्ल किसने किया है सभी को है मालूम
ये देखना है कि इल्ज़ाम किसके सर आये।

शराब ये तो सुबह को ही उतर जायेगी,
पिला वो मय कि नहीं होश उम्र-भर आये ।

बस एक बिरवा मेरे नाम का लगा देना
जो मेरी मौत की तुम तक कभी खबर आये।

वहीं प’ ढूँढना ‘नीरज’ को तुम जहाँ वालो।
जहाँ भी दर्द की बस्ती कोई नज़र आये।

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