कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

इस इश्क़ ए जुनुं की महफ़िल कोई मोल नहीं है दिल का अब
मक़तूल मोहब्बत करता था कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब

दिल कतरा कतरा बिखरा है और आँख से मोती झरते हैं
तुम लाख क़यामत ढा लो पर हम इश्क़ तुम्ही से करते हैं
तुम चाहो तो हमें मिटा दो हम मरने से कब डरते हैं
कल भी तुम पर मरते थे और आज भी तुम पर मरते हैं
बस इतनी तमन्ना बाकी है कुछ जोर बढ़े संगदिल का अब
मक़तूल मोहब्बत करता था कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब

अब उल्फ़त में मिट जाने को तैयार खड़ा दीवाना भी
शमा की आग में जलने को बेताब बड़ा परवाना भी
राह तुम्हारी रौशन हो तो हमें आता है जल जाना भी
मौत भी दो गर तोहफ़े में तुम है मुमकिन गले लगाना भी
मौत हयात के बीच खड़ा हूँ हल दे दो इस मुश्किल का अब
मक़तूल मोहब्बत करता था कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब

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