कोई ऐसा कहाँ-कविता -स्वागता बसु -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Swagata Basu 

कोई ऐसा कहाँ-कविता -स्वागता बसु -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Swagata Basu

जो नग्मों को तहरीर दी, मुझमें है वो बात कहाँ
बड़ी कहानी गढ़ने की, मुझमें है औकात कहाँ
हाँ, जो अंधेरों को चीर, वो नन्हा सा दिया हूँ मैं
जो मुझको अँधियारा कर दे, ऐसी कोई रात कहाँ।।

सन्नाटे जब पहन के घुँघरू, मन में उधम मचाते हैं
अँधियारे के ओट में जब तारे टूट खो जाते हैं
जब अपनों के ताने आकर दिल में आग लगते हैं
तब दिल के आंगन पर बरसे, ऐसी कोई बरसात कहाँ।।

रोटी के एक टुकड़े को जब बच्चा बिलख के रोता है
तेजाब के छींटों से जब चमन फूल को खोता है
छोटा सा एक घाव कभी जब, एक नासूर बन जाता है
तब ज़ख़्मो पर मरहम रख दे, ऐसा कोई हाथ कहाँ।।

इश्क ओ वफ़ा के सारे क़िस्से, जब यूँ ही झूठे लगते हैं
अपने ही अपनो से जब, रूठे रूठे लगते है
तब उनसे मिलने की सारी हसरत पिघल सी जाती है
सपनो की ताबीर बने जो, तब ऐसे जज़्बात कहाँ।।

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