कैसे बतलाऊं क्या क्या करता था-उमेश दाधीच -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Umesh Dadhich

कैसे बतलाऊं क्या क्या करता था-उमेश दाधीच -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Umesh Dadhich

कैसे बतलाऊं क्या क्या करता था
छिप छिप कर चोरी से तुमको
देखा करता था ।
खाली आंखों में मेरी तुमको ही
रोज भरता था ।
बस इतना समझ लो
देख कर तुमको ही जीता था
और बिन देखे रोज मरता था ।
कैसे बतलाऊं…

नजरों के पैमानों से छलकी तो
तुम दिल में उतर गयी ।
दिल को समझाया तो नैनों में
तुम फिर से भर गयी ।
बस इतना समझ लो
तेरा बुखार रोज चढ़ता था और
तेरा खुमार रोज उतरता था ।
कैसे बतलाऊं…

दिल ने हिम्मत की तो लबों ने
बातों को झुठलाया ।
लबों ने शिरकत की तो दिल ने
खुद को समझाया ।
बस इतना समझ लो
दिल खुद से इजहार करता था
रूबरू होकर तुझसे डरता था ।
कैसे बतलाऊं…

ख्वाबों को बहलाता तो बातों में
तुमसे बतलाता था ।
बातों को करता चुप तो ख्वाबों में
खुद को बहकाता था ।
बस इतना समझ लो
उठ उठ कर नींदों में हँसता था
फिर से तेरी यादो में संवरता था।
कैसे समझाऊं क्या क्या करता था
बस इतना समझ लो
तुम से ही था इश्क़ पहला
तुम से ही मोहब्बत करता था ।।

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