कैसी यह मेरे देश में शाश्वत शर्वरी ?-निशीथ-उमाशंकर जोशी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Umashankar Joshi

कैसी यह मेरे देश में शाश्वत शर्वरी ?-निशीथ-उमाशंकर जोशी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Umashankar Joshi

कैसी यह मेरे देश में शाश्वत शर्वरी ?
निद्राच्छन्न जन-जन के लोचन
मूर्च्छाग्रस्त भोलेभाले ह्रदय लोगों के
जानेंगे न क्या ये सब तेरी नृत्यताल से ?
द्यौनट, हे विराट् !
मेरे चित्त में घिरी मृत्युमय तमिस्त्रा
रक्त-स्त्रोत में दास्यं-दुर्भेद्य तन्द्रा।
चूर चूर होंगे न क्या ह्रदय के ये विषाद
पाद-प्रघात से तेरे, हे महानट !
स्फुरित नहीं होंगे क्या धमनियों में
नये संगीत, नृत्य की ताल पर?

देता है चेतना श्रान्तों को तू
प्रफुल्ल कर शोभित करता है प्रकृति-प्रिया को
और मानवों की मनोमृत्तिका में बो रहा तू
स्वप्नों के बीज अनूठे।

तू है सृष्टि की नित-नवीन आशा !
इतना न होगा क्या तुझसे ?
बोल, बोल,
निशीथ ! वैतालिक हे उषा के !

(सितम्बर 1938)

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