कैसी दुनिया हमारी अजब रंग है- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

कैसी दुनिया हमारी अजब रंग है- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

कैसी दुनिया हमारी अजब रंग है
सबके जीने का अपना अलग ढंग है
कोई हँस कर जिए कोई रोता हुआ
देखते सब खड़े जुल्म होता हुआ
शर्म आती नहीं अब किसी बात पर
शाद हैं अब सभी अपने हालात पर
जाम पीना तो अब फख्र की बात है
अब तो डिस्को में कटती हसीं रात है
दिल में धोखा लिए सारे फिरते यहाँ
गिरते किरदार से कोई मतलब कहाँ
अब तो जीने का अपना ही अंदाज है
अब फरेबी सभी सब दग़ाबाज़ हैं
सब हैं झूठे यहाँ सब नज़र तंग हैं
कैसी दुनिया हमारी अजब रंग है

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