केहरि अहार मास, सुरही अहार घास-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

केहरि अहार मास, सुरही अहार घास-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

केहरि अहार मास, सुरही अहार घास
मधुप कमल बास लेत सुख मान ही ।
मीनह निवास नीर, बालक अधार खीर
सरपह सखा समीर जीवन कै जान ही ।
चन्दह चाहै चकोर घनहर घटा मोर
चात्रिक बून्दनस्वांत धरत ध्यान ही ।
पंडित बेद बीचारि, लोकन मै लोकाचार ।
माया मोहो मै संसार, गयान गुर गयान ही ॥५९९॥

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