कृष्ण-चरित्र-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 1

कृष्ण-चरित्र-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 1

 आजु दोउ बैठे मिलि वृंदावन नव निकुंज

आजु दोउ बैठे मिलि वृंदावन नव निकुंज
सीतल बयार सेवें मोदीरे मन मैं ।
उड़त अंचल चल चंचल दुकुल कल
स्वेद फूल की सुगंध छायी उपवन में ।
रस भरे बातें करें हंसि-हंसि अंग भरें
बीरी खात जाता सरसात सखियन में ।
“हरीचन्द’ है राधाप्यारी देखि रीझे गिरिधरी
आनंद सों उमगे समात नहिं तन में ।।

 हरि हम कौन भरोसे जीएँ

हरि हम कौन भरोसे जीएँ ।
तुमरे रुख फेरे करुनानिधि काल-गुदरिया सीएँ ।।
यों तो सब ही खात उदर भरि अरु सब ही जल पीएँ ।
पैधिक धिक तुम बिन सब माधो वादिहिं सासा लीएँ ।।
नाथ बिना सब व्यर्थ धरम अरु अधरम दोऊ कीएँ ।
‘हरीचंद’ अब तो हरि बनिहै कर-अवलम्बन दीएँ ।।

 सखी मनमोहन मेरे मीत

सखी मनमोहन मेरे मीत ।
लोक वेद कुल जानि छाँड़ि हम करी उनहिं सों प्रीति ।।
बिगरी जग के कारण सगरे उलटौ सबही नीत ।
अब तौ हम कबहूं नहिं तजिहैँ पिय की प्रेम प्रतीत ।।
यहै बाहुबल आस यहै इक यहै हमारी रीत ।
‘हरीचंद’ निधरक बिहरैंगी पिय बल दोउ जग जीत ।।

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