कृष्ण-चरित्र-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 2

कृष्ण-चरित्र-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 2

 

हरि मोरी काहें सुधि बिसराई

हरि मोरी काहें सुधि बिसराई ।
हम तो सब बिधि दीन हीन तुम समरथ गोकुल-राई ।।
मों अपराधन लखन लगे जौ तो कछु नहिं बनि आई ।
हम अपुनी करनी के चूके याहू जनम खुटाई ।।
सब बिधि पतित हीन सब दिन के कहँ लौं कहौं सुनाई ।
‘हरीचंद’ तेहि भूलि बिरद निज जानि मिलौ अब धाई ।।

 जयति कृष्ण-पद-पद्य-मकरन्द रंजित

जयति कृष्ण-पद-पद्य-मकरन्द रंजित
नीर नृप भगीरथ बिमल जस-पताके ।
ब्रह्म-द्रवभूत आनन्द मंदाकिनी
अलक नंदे सुकृति कृति-बिपाके ।
शिव-जरा-जूट गह्वर-सघन-वन-मृगी
विधि-कमंडलु-दलित-नीर-रूपे ।

 प्रात समै प्रीतम प्यारे को

प्रात समै प्रीतम प्यारे को मंगल बिमल नवल जस गाऊँ ।
सुन्दर स्याम सलोनी मूरति भोरहि निरखत नैन सिराऊँ ।।
सेवा करों हरों त्रैविधि-भय तब अपने गृह-कारज जाऊँ ।।
“हरीचंद” मोहन बिनु देखे नैनन की नहिं तपत बुझाऊँ ।।

 

 श्याम अभिराम रवि-काम-मोहन सदा

श्याम अभिराम रवि-काम-मोहन सदा
वाम श्री राकि संगलीने ।
कुंज सुख पुंज नित गुंजरत भौंर जहाँ
गुंज-बन-दाम गलमांहिं दीने ।
करत दिन केलि भुज मेलि कुच ठेलि
लखिदास हरिचंद जय जयति कीने ।

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