कृष्ण कन्हैया की तारीफ़- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi 

कृष्ण कन्हैया की तारीफ़- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

सिफ्तो सना में सृष्टि रचैया की क्या लिखूं।
औसाफी खूबी ब्रज के बसैया की क्या लिखूं।
पदायश अब में कुल के करैया की क्या लिखूं।
कुछ मदह में उस सुध के लिवैया की क्या लिखूं।
तारीफ कहो कृष्ण कन्हैया की क्या लिखूं॥

श्री वेद व्यास जी ने बनाये कई पुरान।
लिखने में तो भी आया नहीं कृष्ण का बयान।
लिख-लिख के थक रहे हैं हर एक कर नविश्त ख्वान।
कहती है जो कलम मेरी वह है जली ज़बान॥ तारीफ..

आ द्वारका से द्रोपदी का चीर बढ़ाया।
बैकुंठ से आ ग्राह से गजराज छुड़ाया।
प्रहलाद को जलने से अगन के बीच बचाया।
मेवा को त्याग साग विदुर के यहाँ खाया॥ तारीफ..

परबत रखा है उँगली पै जों रुई का गाला।
संग ग्वाल बाल लेके खड़े नन्द के लाला।
बंसी बजाते नृत्य करते भार को टाला।
दिन सात में इन्दर का सभी गर्व निकाला॥ तारीफ..

गायें चराके ओवं थे संग ग्वाल बाल से।
हर तरफ आग देख कहैं सब गुपाल से॥
अब के हमें बचाओ यहाँ किसी चाल से।
आँखें मिचा बचाया उन्हें अग्नि जाल से॥ तारीफ..

अब क्या कहूँ मैं तुमसे उनकी लतीफ बात।
पीतम्बर ओढ़ लेट रहे वे छुपा के गात।
भृगुजी ने वों ही आन के छाती पै मारी लात।
जब पाँव दबाने लगे श्री कृष्ण अपने हाथ॥ तारीफ..

क्या क्या बयान हो सकें जो जो किये हैं काम।
दो पेड़ थे वहाँ खड़े जो नंद जी के धाम।
और दही डाल हाथ बँधाए उन्हों के काम।
ऊखल से बाँध हाथ उन्हें नाक भेजा शाम॥ तारीफ..

फरजंद गुरू के सबी एक आन में लाए।
फिर तीनों लोक मुँह में जसोदा को दिखाए।
छोनी अठारह रंग में जो भारत के जुझाए।
तहाँ अंडे भारथी के घंटा से बचाए॥ तारीफ..

सुरजन सा दुष्ट जान के जुन्नार से छोड़ा।
एक आन में जिन मार लिया केसरी घोड़ा।
आंधी में जो तिनावर्त को तिनका सा तोड़ा।
और नाम धराया है जो फिर आप भगोड़ा॥ तारीफ..

एक दम में किये दूर सुदामा के दरिद्दर।
कंचन के सभी कर दिये एक आन में मंदर।
जो चाहे कोई करता हरी आप विसंभर।
फिर आप गए दान को बलि राजा के दर पर॥ तारीफ..

सोलह हजार कैद से छुटवाई हैं रानी।
दिन रात कहा करतीं थीं वे कृष्ण कहानी।
रथवान हो अर्जुन के कही गोष्ठ पुरानी।
फिर अपने बचन सेती भए दधि के जो दानी॥ तारीफ..

कहता नज़ीर तेरे जो दासों का दास है।
दिन रात उसको तेरे ही चरनों की आस है।
ना समुझे एक तेरे ही से नित विलास है।
गुन गाए से तेरा हिये हरदम हुलास है।
तारीफ कहो कृष्ण कन्हैया की क्या लिखूँ॥

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