कृषक क्षुधित रह जाता।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

कृषक क्षुधित रह जाता।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

कड़ी धूप में तप खेतों पर
मिट्टी, पत्थर या रेतों पर,
मिहनत के बल चीर धरा को अतिशय अन्न उगाता।
कृषक क्षुधित रह जाता।

तन ढकने तक नहीं वस्त्र है
जीवन सुखमय नहीं, त्रस्त है,
ढोके हरदम बोझ कर्ज का विकल अन्न का दाता।
कृषक क्षुधित रह जाता।

पूर्ण दाम पर बिके न दाने
लागत लगती नींद उड़ाने,
खुले गगन के तले कनक का हश्र अतीव रुलाता।
कृषक क्षुधित रह जाता।

पग -पग पर बिखरी लाचारी
जीवन दूभर लगता भारी,
होने को उन्मुक्त व्यथा से निज अस्तित्व मिटाता।
कृषक क्षुधित रह जाता।

 

Leave a Reply