कृपा करो-आखिर समुद्र से तात्पर्य-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

कृपा करो-आखिर समुद्र से तात्पर्य-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

 

क्या कहूँ?
कहो तुम्हें क्या कहूँ
ओ मेरे जन्म-मास फाल्गुन!
तुम्हें क्या कहूँ?

तुम तो स्वयं ही संवत्सर द्वारा
रंग-वर्ण-गन्ध से सुसज्जित
वानस्पतिक अंग-अंग अनंग हो
नहीं–
पूर्णकाम काव्य-कृष्ण हो।

घास के अनाम फूलों से लेकर
पलाश औ कचनार तक,
कहाँ-कहाँ
कौन नहीं उपकृत है
तुमसे
तुमसे इस अनुग्रह रंग-रास से?
फूल होने का अर्थ ही है
फाल्गुन हो जाना।
ओ मेरे जन्म-मास!
मुझे तो पूरा फूल भी नहीं
मिल जाती यदि फूल की मात्र एक पाँखुरी
तो सच मानो
इस भाषा के जग में
बच जाता होने से किरकिरी।

ओ मेरे जन्म-मास फाल्गुन! कृपा करो
मैं भी हूँ
नामहीन तुम्हारी ही मानुषी-वनस्पति।

 

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