कूआ को मेढकु निधि जानै कहा सागर की-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

कूआ को मेढकु निधि जानै कहा सागर की-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

कूआ को मेढकु निधि जानै कहा सागर की
स्वांतबून्द महमा न संख जानयी ।
दिनकरि जोति को उदोत कहा जानै उलू
सेंबल सै कहा खाय सूहा हित ठानयी ।
बायस न जानत मराल माल संगति
मरकट मानकु हीरा न पहचानयी ।
आन देव सेवक न जानै गुरदेव सेव
गूंगे बहरे न कह सुनि मनु मानयी ॥४७०॥

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