कुल्लू वादी-रात पश्मीने की-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar 

कुल्लू वादी-रात पश्मीने की-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

बादलों में कुछ उड़ती हुई भेड़ें नज़र आती हैं
दुम्बे दिखते हैं कभी भालू से कुश्ती लड़ते
ढीली सी पगड़ी में एक बुड्ढा मुझे देख के
हैरान सा है

कोई गुजरा है वहां से शायद
धुप में डूबा हुआ ब्रश लेकर
बर्फों पर रंग छिड़कता हुआ- जिस के कतरे
पेड़ों की शाखों पे भी जाके गिरे हैं

दौड़ के आती है बेचैन हवा झाड़ने रंगीन छीटें
ऊँचे, जाटों की तरह सफ में खड़े पेड़ हिला देती है
और एक धुंधले से कोहरे में कभी
मोटरें नीचे उतरती हैं पहाड़ों से तो लगता है
चादरें पहने हुए, दो दो सफों में
पादरी शमाएँ जलाये हुए जाते हैं इबादत के लिए

कुल्लू की वादी में हर रोज यही होता है
शाम होते ही बादल नीचे
ओढ़नी डाल के मंजर पे, मुनादी करने
आज दिन भर की नुमाइश थी, यहीं ख़त्म हुई

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