कुतुब के खँडहर-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur 

कुतुब के खँडहर-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur

सेमल की गरमीली हल्की रुई समान
जाड़ों की धूप खिली नीले आसमान में
झाड़ी-झुरमुटों से उठे लम्बे मैदान में ।
रूखे पतझर-भरे जंगल के टीलों पर
कांप कर चलती समीर हेमन्त की
लम्बी लहर-सी ।
दूरी के ठिठुरे-से भूरे पेड़ों पर
ठण्डे बबूले बना धूल छा जाती थी-
रेतीले पैरों से धीरे ही दाब कर
काई से काले पड़े ध्वंस राजमहलों को,
पत्थर के ढेर बने मन्दिर-मज़ारों को,
जिनसे अब रोज़ साँझ कुहरा निकलता या
प्यासे सपनों की मंडराती हुई छाँह-सा ।
गूँजता था सूनसान-
उजड़ खंडेरों में
गिरते थे पत्ते,
वन-पंछी नहीं बोलते थे,
नाले की धार किनारे से लगी जाती थी ।

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