कुण्डलिया छंद-कविता-परमजीत कौर रीत-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Paramjeet Kaur Reet

कुण्डलिया छंद-कविता-परमजीत कौर रीत-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Paramjeet Kaur Reet

 

हिन्दी की महिमा परम, वैज्ञानिक है रूप।
सरल-हृदयग्राही-मधुर, विकसित कोष अनूप।
विकसित कोष अनूप, तरलता रही उदय से।
बोली-भाषा अन्य, शब्द जुड़ गये हृदय से।
भारत की है शान, भाल की जैसे बिन्दी।
सुरभाषा का अंग, ‘रीत’ है अपनी हिन्दी।

तकनीकी विस्तार ने, खूब बढाया मान।
विश्व पटल पर मिल रही, हिन्दी को पहचान।
हिन्दी को पहचान, विदेशों ने अपनायी।
लेकिन अपने देश, सुता क्यों हुई परायी।
राजभाषिका मान, सहज उपलब्धि इसी की।
बढ़ जाएगा शान, बनेगी जब तकनीकी।

निज भाषा संस्कार पर, कर न सके जो मान।
जग में हो उपहास औ’, खो बैठे सम्मान।
खो बैठे सम्मान, जाति वह सदा पिछडती।
निज भाषा उत्थान, दशा से बात सुधरती।
होता तभी विकास, बँधेगी फिर नव-आशा।
उत्तम रहें प्रयास, फले-फूले निज भाषा।

आओ मिल सारे करें, मन से यह प्रण आज।
हिन्दी में होंगे सभी, अपने सारे काज।
अपने सारे काज, राज की हिन्दी भाषा।
पायेगी सम्मान, देश की बनकर आशा।
छोड विदेशी राग, इसी का गौरव गाओ।
हिन्दी पर है गर्व, शान से बोलें आओ।

आए सूरज देव हैं, सुत-घर करन निवास
काल मकर-सक्रांति में, पूजन औ उपवास
पूजन औ उपवास, कहीं माघी के मेले
दीप-दान औ’ स्नान, भीड़ के चहुँ-दिस रेले
सद्कर्मों का मास, माघ बस यह समझाए
‘रीत’ कर्म अनुरूप, चखो फल जो भी आए

फैला डोर पतंग का, आसमान में जाल
सूरज को ढँकने चला, सतरंगी रूमाल
सतरंगी रूमाल, झूम बोले मतवाला
नभ में है त्यौहार, पतंगों वाला आला
पल में कटे पतंग, नहीं पर मन कर मैला
डोरी दाता हाथ, जाल सिखलाता फैला

मन में जब हों दूरियाँ, हिम हो जाएँ भाव
संबंधों को तापता, तब बस नेह अलाव
तब बस नेह अलाव, तरल हिमकण को करता
गुड़-गज्जक की भाँति, मधुरता मन में भरता
मोल नेह का ‘रीत’, समझ लें यदि जीवन में
मिट जाएँ सब द्वन्द्व, सदा हों खुशियाँ मन में

डैनों में विश्वास भर, बढें क्षितिज की ओर
देती है संदेश यह, नवल वर्ष की भोर
नवल वर्ष की भोर, और अरुणाई कहती
उत्तम रहें प्रयास, सफलता मिलकर रहती
चलते रहते पाँव, सदा जो दिन-रैनों में
बना लक्ष्य विश्वास, रहे उनके डैनों में।

राहें दुर्गम हों भले, सुविधाएँ हों अल्प
फिर भी नूतन वर्ष में, करना है संकल्प
करना है संकल्प, और है बढ़ना ऐसे
गढ़ना है निजरूप, शिला गरिमामय जैसे
निश्छल रखना कर्म, मिटेंगी दुख की आहें
उजलायेंगी ‘रीत’, कभी तो अपनी राहें।

फेरी छाया धूप की, साथी सहना मौन
पतझड़ बिना बसंत को, जान सका है कौन
जान सका है कौन, यही है अनुभव कहता
प्रातकाल निर्बाध, सदा है आकर रहता
नवल वर्ष की भोर, खिलेगी खुशियाँ ढेरी
‘रीत’ सुनो हे मीत, घटेगी पतझड़ फेरी।

 

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