कुण्डलियां-साधना ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sadhana Thakurela Part 2

कुण्डलियां-साधना ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sadhana Thakurela Part 2

चलती रहती जिंदगी

चलती रहती जिंदगी, ज्यों कागज़ की नाव ।
लोग भटकते लक्ष्य से, करते नहीं चुनाव ।।
करते नहीं चुनाव, हवा खे कर ले जाती ।
कुछ हो जाती पार, कहीं पर भँवर डुबाती ।
कहे ‘साधना’ सत्य, करो मत कोई गलती ।
हाथ रखो पतवार, नाव तब ढंग से चलती ।।

जाला मकड़ी बुन रही

जाला मकड़ी बुन रही, करके यही विचार ।
कीट फसेंगे जाल में, कर लूँ सहज शिकार ।।
कर लूँ सहज शिकार, मजे से पेट भरुँगी ।
ऐश करूँ दिन-रात, नहीं अब कभी मरूंगी ।
खुद फँस खुद के जाल, सहज बन गयी निवाला ।
ऐसे ही इंसान, बनाता रहता जाला।।

नेकी कर के भूल जा

नेकी कर के भूल जा, मत कर उसको याद ।
मिल जायेगा फल तुझे, कुछ दिन के ही बाद ।।
कुछ दिन के ही बाद, मिले यश, मान, बड़ाई ।
दे सुख अमित, अपार, यही है नेक कमाई ।
कहे ‘साधना’ सत्य, याद रखना जाने की ।
मानव बनो प्रबुद्ध, करो तुम हर दिन नेकी ।।

आजादी की आड़ में

आजादी की आड़ में, नारी हुई असभ्य ।
रँगी पश्चिमी रंग में, खुद को समझे सभ्य ।।
खुद को समझे सभ्य, भूल बैठी मर्यादा ।
सभ्य जनों की सीख, न उसको भाती ज्यादा ।
कहे ‘साधना’ सत्य, कर रही खुद बर्बादी ।
विस्मित हैं सब लोग, भला ये क्या आजादी ।।

पाला जिसने भी यहाँ

पाला जिसने भी यहाँ, अति लगाव का रोग ।
तृप्त नहीं कर पायेंगे, उसे जगत के भोग।।
उसे जगत के भोग, लालसा बढ़ती जाये ।
जैसे घृत से आग, न बुझती कभी बुझाये ।
कहे ‘साधना’ सत्य, हो रहा क्यों मतवाला ।
कब उसका कल्याण, रोग जिसने यह पाला ।।

सपने देखो जागकर

सपने देखो जागकर, और करो साकार ।
अनथक परिश्रम हो अगर, लेंगे वे आकार ।।
लेंगे वे आकार, नया निर्माण करोगे ।
हासिल होगा लक्ष्य, राष्ट्र का भला करोगे ।
कहे ‘साधना’ सत्य, कर्मफल होते अपने।
जो भी लेता ठान, सत्य हो जाते सपने ।।

सुख-सुविधा ज्यादा मिली

सुख-सुविधा ज्यादा मिली, रोगी हुआ शरीर।
आलस बढ़ता ही गया, भोग रहे अब पीर ।।
भोग रहे अब पीर, सुखों का करें दिखावा ।
हो यथार्थ से दूर, स्वयं से करें छलावा ।
कहे ‘साधना’ सत्य, न रहती कोई दुविधा ।
श्रम से बने शरीर, यही सच्ची सुख-सुविधा ।।

वाणी औ’ मन पर रखो

वाणी औ’ मन पर रखो, सदा नियंत्रण आप ।
स्वयं दूर हो जायेंगे, जीवन के संताप ।।
जीवन के संताप, शीलनिधि लोग कहेंगे ।
आकर्षक व्यक्तित्व, धनी हम बने रहेंगे ।
कहे ‘साधना’ सत्य, ठीक कब है मनमानी।
मन पर लगाम, सँभल कर बोलो वाणी ।।

माता अपनी कोख से

माता अपनी कोख से मत जन ऐसा लाल ।
करे कलंकित कोख को, झुके देश का भाल।।
झुके देश का भाल, सभ्यता नष्ट करेगा ।
जाए यदि परदेश, शर्म से डूब मरेगा ।
कहे ‘साधना’ सत्य, समय हमको समझाता ।
करे सुसंस्कृत वत्स, कोख में से ही माता ।।

द्वापर में कब मिल सका

द्वापर में कब मिल सका, द्रुपद – सुता को न्याय ।
कलयुग में भी हो रहा, उसके प्रति अन्याय ।।
उसके प्रति अन्याय , बात कैसी गढ़ डाली ।
हुआ प्रचारित झूँठ, द्रोपदी ने दी गाली ।
कहे ‘साधना’ सत्य, महाभारत समझाकर ।
दो नारी को न्याय, भले कलयुग या द्वापर ।।

 

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