कुण्डलियाँ -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 2

कुण्डलियाँ -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 2

 

नहीं समझता मंदमति

नहीं समझता मंदमति, समझाओ सौ बार ।
मूरख से पाला पड़े, चुप रहने में सार ।।
चुप रहने में सार, कठिन इनको समझाना ।
जब भी जिद लें ठान, हारता सकल ज़माना ।
‘ठकुरेला’ कविराय, समय का डंडा बजता ।
करो कोशिशें लाख, मंदमति नहीं समझता ।।

धीरे धीरे समय ही

धीरे धीरे समय ही, भर देता है घाव ।
मंजिल पर जा पंहुचती, डगमग होती नाव ।।
डगमग होती नाव, अंततः मिले किनारा ।
मन की मिटती पीर, टूटती तम की कारा ।
‘ठकुरेला’ कविराय, खुशी के बजें मजीरे ।
धीरज रखिये मीत, मिले सब धीरे धीरे ।।

तिनका तिनका जोड़कर

तिनका तिनका जोड़कर, बन जाता है नीड़ ।
अगर मिले नेत्तृत्व तो, ताकत बनती भीड़ ।।
ताकत बनती भीड़, नये इतिहास रचाती ।
जग को दिया प्रकाश, मिले जब दीपक, बाती ।।
‘ठकुरेला’ कविराय, ध्येय सुन्दर हो जिनका ।
रचते श्रेष्ठ विधान, मिले सोना या तिनका ।।

बढ़ता जाता जगत में

बढ़ता जाता जगत में, हर दिन उसका मान ।
सदा कसौटी पर खरा, रहता जो इंसान ।।
रहता जो इंसान, मोद सबके मन भरता ।
रखे न मन में लोभ, न अनुचित बातें करता ।
‘ठकुरेला’ कविराय, कीर्ति-किरणों पर चढ़ता ।
बनकर जो निष्काम, पराये हित में बढ़ता ।।

दीपावली ( काव्यगंधा से)

आती है दीपावली, लेकर यह सन्देश ।
दीप जलें जब प्यार के, सुख देता परिवेश ।।
सुख देता परिवेश,प्रगति के पथ खुल जाते ।
करते सभी विकास, सहज ही सब सुख आते ।
‘ठकुरेला’ कविराय, सुमति ही सम्पति पाती ।
जीवन हो आसान, एकता जब भी आती ।।

दीप जलाकर आज तक, मिटा न तम का राज ।
मानव ही दीपक बने, यही माँग है आज ।।
यही माँग है आज,जगत में हो उजियारा ।
मिटे आपसी भेद, बढ़ाएं भाईचारा ।
‘ठकुरेला’ कविराय ,भले हो नृप या चाकर ।
चलें सभी मिल साथ,प्रेम के दीप जलाकर ।।

जब आशा की लौ जले, हो प्रयास की धूम ।
आती ही है लक्ष्मी, द्वार तुम्हारा चूम ।।
द्वार तुम्हारा चूम, वास घर में कर लेती ।
करे विविध कल्याण, अपरमित धन दे देती ।
‘ठकुरेला’ कविराय, पलट जाता है पासा ।
कुछ भी नहीं अगम्य, बलबती हो जब आशा ।।

दीवाली के पर्व की, बड़ी अनोखी बात ।
जगमग जगमग हो रही, मित्र, अमा की रात ।।
मित्र, अमा की रात, अनगिनत दीपक जलते ।
हुआ प्रकाशित विश्व, स्वप्न आँखों में पलते ।
‘ठकुरेला’ कविराय,बजी खुशियों की ताली ।
ले सुख के भण्डार, आ गई फिर दीवाली ।।

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