कुण्डलियाँ -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 1

कुण्डलियाँ -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 1

रत्नाकर सबके लिए

रत्नाकर सबके लिए, होता एक समान ।
बुद्धिमान मोती चुने, सीप चुने नादान ।।
सीप चुने नादान, अज्ञ मूंगे पर मरता ।
जिसकी जैसी चाह, इकट्ठा वैसा करता ।
‘ठकुरेला’ कविराय, सभी खुश इच्छित पाकर ।
हैं मनुष्य के भेद, एक सा है रत्नाकर ।।

आगे बढ़ता साहसी

आगे बढ़ता साहसी, हार मिले या हार ।
नयी ऊर्जा से भरे, बार बार, हर बार ।।
बार बार, हर बार, विघ्न से कभी न डरता ।
खाई हो कि पहाड़, न पथ में चिंता करता ।
‘ठकुरेला’ कविराय, विजय-रथ पर जब चढ़ता ।
हों बाधायें लाख, साहसी आगे बढ़ता ।।

थोथी बातों से कभी

थोथी बातों से कभी, जीते गये न युद्ध ।
कथनी पर कम ध्यान दे, करनी करते बुद्ध ।।
करनी करते बुद्ध, नया इतिहास रचाते ।
करते नित नव खोज, अमर जग में हो जाते ।
‘ठकुरेला’ कविराय, सिखातीं सारी पोथी ।
ज्यों ऊसर में बीज, वृथा हैं बातें थोथी ।।

भातीं सब बातें तभी

भातीं सब बातें तभी, जब हो स्वस्थ शरीर ।
लगे बसंत सुहावना, सुख से भरे समीर ।।
सुख से भरे समीर, मेघ मन को हर लेते ।
कोयल, चातक मोर, सभी अगणित सुख देते ।
‘ठकुरेला’ कविराय, बहारें दौड़ी आतीं ।
तन, मन रहे अस्वस्थ, कौन सी बातें भातीं ।।

हँसना सेहत के लिए

हँसना सेहत के लिए, अति हितकारी मीत ।
कभी न करें मुकाबला, मधु, मेवा, नवनीत ।।
मधु, मेवा, नवनीत, दूध, दधि, कुछ भी खायेँ ।
अवसर हो उपयुक्त, साथियो हँसे – हँसायें ।
‘ठकुरेला’ कविराय, पास हँसमुख के बसना ।
रखो समय का ध्यान, कभी असमय मत हँसना ।।

चलते चलते एक दिन

चलते चलते एक दिन, तट पर लगती नाव।
मिल जाता है सब उसे, हो जिसके मन चाव ।।
हो जिसके मन चाव, कोशिशें सफल करातीं ।
लगे रहो अविराम, सभी निधि दौड़ी आतीं ।
‘ठकुरेला’ कविराय, आलसी निज कर मलते ।
पा लेते गंतव्य, सुधीजन चलते चलते ।।

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