कुछ मोल गंवाने ही होंगे- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

कुछ मोल गंवाने ही होंगे- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

धृतराष्ट्र आज भी फंसा हुआ है पुत्रमोह के घेरे में
अब भी अन्तर्मन उलझ रहा है कुटिल दाँव के फेरे में
आज भी चौपड़ सजती है और चीरहरण भी होता है
दुर्योधन के दरबारों में लज्जा का क्षरण भी होता है
अनाचार के चक्रव्यूह में कई अभिमन्यु मिट जाते हैं
छल के सघन उपासक अब भी महारथी कहलाते हैं
भीष्म पड़े मजबूर हैं अब भी सिंहासन की रक्षा को
अन्तिम कुरू को ताक रही है कृष्णा अपनी सुरक्षा को
अपमानित करने को पापी उसके वस्त्र को खींच रहा है
द्यूत सभा का सन्नाटा अब भी अनाचार को सींच रहा है
सुमिरन करती है असहाय द्रोपदी चक्र सुदर्शन धारी का
कलियुग में माधव भी नहीं आते सम्मान बचाने नारी का
इस युग में पांचाली को हाथों में हथियार उठाना ही होगा
भरी सभा में दुःशासन को चण्डी रूप दिखाना ही होगा
अब सहन शक्ति संकोच सरीखे कुछ मोल गंवाने ही होंगे
उसे खुद के दाँव लगाए जाने पर खुद प्रश्न उठाने ही होंगे

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