कुकुरमुत्ता-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 1

कुकुरमुत्ता-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 1

 गर्म पकौड़ी

गर्म पकौड़ी-
ऐ गर्म पकौड़ी,
तेल की भुनी
नमक मिर्च की मिली,
ऐ गर्म पकौड़ी !
मेरी जीभ जल गयी
सिसकियां निकल रहीं,
लार की बूंदें कितनी टपकीं,
पर दाढ़ तले दबा ही रक्‍खा मैंने

कंजूस ने ज्‍यों कौड़ी,
पहले तूने मुझ को खींचा,
दिल ले कर फिर कपड़े-सा फींचा,
अरी, तेरे लिए छोड़ी
बम्‍हन की पकाई
मैंने घी की कचौड़ी।

प्रेम-संगीत

बम्हन का लड़का
मैं उसको प्यार करता हूँ।

जात की कहारिन वह,
मेरे घर की है पनहारिन वह,
आती है होते तड़का,
उसके पीछे मैं मरता हूँ।

कोयल-सी काली, अरे,
चाल नहीं उसकी मतवाली,
ब्याह नहीं हुआ, तभी भड़का,
दिल मेरा, मैं आहें भरता हूँ।

रोज़ आकर जगाती है सबको,
मैं ही समझता हूँ इस ढब को,
ले जाती है मटका बड़का,
मैं देख-देखकर धीरज धरता हूँ।

(रचनाकाल: 22 फरवरी, 1939)

रानी और कानी

माँ उसको कहती है रानी
आदर से, जैसा है नाम;
लेकिन उसका उल्टा रूप,
चेचक के दाग, काली, नक-चिप्टी,
गंजा-सर, एक आँख कानी।

रानी अब हो गई सयानी,
बीनती है, काँड़ती है, कूटती है, पीसती है,
डलियों के सीले अपने रूखे हाथों मीसती है,
घर बुहारती है, करकट फेंकती है,
और घड़ों भरती है पानी;
फिर भी माँ का दिल बैठा रहा,
एक चोर घर में पैठा रहा,
सोचती रहती है दिन-रात
कानी की शादी की बात,
मन मसोसकर वह रहती है
जब पड़ोस की कोई कहती है-
“औरत की जात रानी,
ब्याह भला कैसे हो
कानी जो है वह!”

सुनकर कानी का दिल हिल गया,
काँपे कुल अंग,
दाईं आँख से
आँसू भी बह चले माँ के दुख से,
लेकिन वह बाईं आँख कानी
ज्यो-की-त्यों रह गई रखती निगरानी।

(रचनाकाल : 1939 ई.)

मास्को डायेलाग्स

मेरे नए मित्र हैं श्रीयुत गिडवानीजी,
बहुत बड़े सोश्यलिस्ट,
“मास्को डायेलाग्स” लेकर आए हैं मिलने।
मुस्कराकर कहा, “यह मास्को डायेलाग्स है,
सुभाष बाबू ने इसे जेल में मंगाया था।
भेंट किया था मुझको जब थे पहाड़ पर।
’35 तक, मुश्किल से पिछड़े इस मुल्क में
दो प्रतियाँ आई थीं।”
फिर कहा, “वक्‍त नहीं मिलता है,
बड़े भाई साहब का बँगला बन रहा है,
देखभाल करता हूँ।”
फिर कहा, “मेरे समाज में बड़े-बड़े आदमी हैं,
एक-से हैं एक मूर्ख;
उनको फँसाना है,
ऐसे कोई साला एक धेला नहीं देने का।
उपन्यास लिखा है,
जरा देख दीजिए।
अगर कहीं छप जाए
तो प्रभाव पड़ जाए उल्लू के पट्ठों पर;
मनमाना रुपया फिर ले लूँ इन लोगों से;
नए किसी बँगले में एक प्रेस खोल दूँ;
आप भी वहाँ चलें,
चैन की बंसी बजे।”
देखा उपन्यास मैंने,
श्रीगणेश में मिला-
“पृय असनेहमयी स्यामा मुझे प्रैम है।”
इसको फिर रख दिया, देखा “मास्को डायेलाग्स”,
देखा गिडवानी को।

(रचनाकाल: 1940 ई.)

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