कुकुरमुत्ता-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 3

कुकुरमुत्ता-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 3

खेल

जेठ की दुपहर, दिवाकर प्रखरतर,
जली है भू, चली है लू भासकर।

राह निर्जन, मन्द चितवन से खड़ा
एक लड़का, बना है छड़ का कड़ा।

उम्र नौ-दस साल की, बस, तौलता
दिल की चढ़कर पकरिये पर बोलता।

तना मोटा था, पड़ा छोटा सुकर,
बाँह से भरकर चढ़ा, आया उतर।

डाल देखी, चढ़ा ऊपर पकड़कर,
दम लिया कुछ देर बैठा अकड़कर।

शाख पर चढ़ता हुआ, ऊपर गया,
नाक बैठाकर निकाला स्वर नया,

“भूत हों जितने जहाँ जमदूत हों,
अब हमारा घर भरें वे खारुओं।”

(रचनाकाल : 1942 ई.)

खजोहरा

दौड़ते हैं बादल ये काले काले,
हाईकोर्ट के वकले मतवाले।

जहाँ चाहिए वहाँ नहीं बरसे,
धान सूखे देखकर नहीं तरसे।

जहाँ पानी भरा वहाँ छूट पड़े,
क़हक़हे लगाते हुए टूट पड़े।

फिर भी यह बस्ती है मोद पर
नातिन जैसे नानी की गोद पर;

नाम है हिलगी, बनी है भूचुम्बी
जैसी लौकी की लम्बी तुम्बी।

कच्चे घर ऊबड़खावड़, गन्दे
गलियारे, बन्द पड़े कुल धन्धे।

लोग बैठे लेते हैं जमहाई,
ठण्डी-ठण्डी चलती है पुरवाई।

खरीफ निराई जा चुकी है, नहीं
करने को रहा कोई काम कहीं।

बारिश से बढ़ी ज्वार, बाजरा, उर्द,
गाँव हरे-भरे कुल, कलाँ और खुर्द।

लोग रोज़ रात को आल्हा गाते
ढोलक पर, अपना जी बहलाते।

झूला झूलती गाती हैं सावन
औरतें, “नहीं आये मनभावन !”

लड़के पंगे मारते हैं बढ़ – बढ़कर
गूंज रहा है भरा हुआ अम्बर।

सावन में भतीजा होने को हुआ
पहले से बुला लायी गयी बुआ।

नैहर में घूंघट के उठने से
बुआजी की जान बची छुटने से।

ब्याह के पहले के प्यारे – प्यारे
गाँव के नज्जारे जग गये सारे।

याद आयी सहेलियाँ, साथी कुल;
तरह-तरह की हुईं रंगरेलियाँ कुल ।

मुन्नी – मुन्ने जितने हैं चुन्नी – चुन्ने,
आँखों पर फिरते हैं सभी टुन्नी-टुन्ने ।

कोई नहीं, लड़कियाँ गयी ससुराल,
लड़के गये बढ़कर परदेस, यह हाल ।

मगर दिल बहलाने के लिए फिलहाल
बुआ नहाने चली वह बाग का ताल ।

पिछला पहर दिन का, पीली पड़ी धूप;
सारे गाँव का हुआ सुनहला रूप ।

सब्जे – सब्जे पर सोने का पानी चढ़ा,
हुस्न और जमाल जैसे और बढ़ा।

गाँव के किनारे निकल आयी बुआ,
बंधी जगतवाला दायें मिला कुआं।

नीम से लगा कच्चा चबूतरा,
टिन्ना बैठा काट रहा था दोहरा।

देखकर बुआ को मुस्कराया, पूछा-
“अकेली – अकेली कहाँ चली बुआ ?”

गुस्सा आया, बुआ काँपने लगी,
गालियों से गला नापने लगी।

आगे बढ़ी, चढ़े आवरू खमदार,
स्वाभिमान से पड़े पहलू दमदार ।

वायी वगल कुछ आगे बढ़ी कि पड़ी
गाँव के किनारे की बड़ी गड़ही।

भरी हुई किनारे तक, उमड़ चली,
बहती हुई गाँव के नाले से मिली ।

मेंढ़क एक बोलता है जैसे सुकरात,
दूसरा फ़लातूं सुन रहा है बात।

तेज हवा से पछाँह को झुके
ज्वार के पौधे सिपाही जैसे दिखे।

वनविलाव मार्लबरी जैसा अड़ा
घोसले के पास गूलर पर चढ़ा।

इसी वक्‍त बिल से लोमड़ी निकली,
इधर – उधर देखती आगे बढ़ी।

भुजैल एक बोलती है “पण्डित जी”
मेड़ के किनारे चुगती है पिड़की ।

सतभैये एक पेड़ के नीचे
दूसरी पार्टी से लड़ाते हैं पंजे ।

एक डाल पर बैठी हुई रुकमिन
बुआ को याद आये पी से मिलने के दिन ।

एक पेड़ पर वये के झोझें दिखी
अलग-अलग झूले जैसी कितनी लटकी ।

एक तरफ भगा हुआ मोर गया,
झाड़ी से चौगड़ा कूदता निकला।

दूर चला जाता है हिरनो का झुण्ड,
भैंसों के लेवारेवाला मिला कुण्ड ।

दौड़कर बबूल पर चढ़ा गिरदान,
देखा बुआ ने भवो की तिरछी वान।

चौतरफा आम के पेड़ों से घिरा,
बुआ को नहानेवाला ताल मिला ।

कितना पुराना, किसका खोदाया हुआ,
गाँव के किसी को यह मालूम न था।

बाँध ताल के, बारिश से छटकर,
ढाल में अब बदल गये थे कटकर ।

मिट्टी भर जाने से ताल उथला था,
डूबने से लोगों को बचाता रहा।

किनारे – किनारे लगे आम के पेड़,
दूर से उठायी ऊँची – ऊँची मेड़।

मिट्टी के सबब दूध ऐसा था पानी,
खुश होकर बुआ ने नहाने की ठानी।

उतरी जैसे ठाकुर की विजयिनी हो,
जिसके दिल में नहीं आज-कल-परसो;

एक प्रेम हो ऐड़ी से चोटी तक,
जिसको चाहती है दुबली से मोटी तक ।

बुआ ताल में पैठी जैसे हथनी,
डर के मारे काँपने लगा पानी;

लहरें भगीं चढ़ने को किनारे पर,
बाँधा पानी बुआ ने बाहों से भरकर।

नीव के खम्भे हों, पैर कीच में है;
जाँघ से छाती तक अंग बीच में है।

सोचा, कभी नहाती थी दिन-दिन भर,
लडकियों को गाड़ती थी गिन-गिनकर ।

विजय का मद आया कि देखे भुजदण्ड,
पहले से और चढ़े हुए, और प्रचण्ड ।

साँस ली बुआ ने, तेज़ चली हवा,
झोका पुरवाई का एक आ लगा।

बुआ के ऊपर की आम की जो डाल
झोके से पुरवाई के हिली तत्काल ।

छमा माँगने को मदनजसा बैठा
डाल पर बड़ा – सा खजोहरा था;

रोयाँ हर एक उसका तीर फूल का था
सुन्दरी की ओर को तना हुआ।

बुआ के कन्धे पर टूटकर आया,
चाँटे के पड़ते ही पिलौधा हुआ;

रोएं आये कन्‍धों, हथेलियों पर,
बांहों पर, पानी पर बहेलियों पर।

जहाँ – जहाँ गड़े, ज़ोर की खुजली
उठी, बुआ ताल के बाहर निकली।

निकलते, कुल अंगों में पानी के साथ,
फैली, खुजलाने लगी वे दोनो हाथ ।

एक छन में जलन सौगुनी बढ़ी,
बुआ जैसे अंगारों पर हो खड़ी;

धोती बदलनी थी, पर न बदल सकी,
मात नील गाय को करती वे भगी।

अंधेरा हो आया था, इतनी भलाई,
कोई उनकी न देख पाया भगाई।

चौकड़ी उठाती गाँव को आयी,
दरवाज़े “अम्मा” की आवाजें लगायी ।

अम्मा ने जल्द आकर दरवाज़ा खोला,
पूछा, “अरी बिट्टो, तुमको क्या हुआ?”

बुआ ने कहा, “मुआ खजोहरा,
नहाते – नहाते मुझको लग गया ।”

घी ले आयी अम्मा, पूछा “कहाँ लगे ?”
बुआ ने कहा कि नहीं बची जगह।

(खजोहरा=एक तरह का रोएँदार छोटा कीड़ा
जिसके स्पर्श से खुजली होने लगती है।)

(अगस्त, 1941)

 

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