कि दूर-दूर तलक एक भी दरख़्त न था-गीतिका-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

कि दूर-दूर तलक एक भी दरख़्त न था-गीतिका-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

…कि दूर-दूर तलक एक भी दरख़्त न था ।
तुम्हारे घर का सफ़र इस क़दर सख़्त न था ।

हम इतने लीन थे तैयारियों में जाने की
वो सामने थे, उन्हें देखने का वक़्त न था ।

लुटा के अपनी खुशी जिसने चुन लिए आंसू
वो बादशाह था, गो उस पे ताजी तख़्त न था।

मैं जिसकी खोज में ख़ुद खो गया था मेले में
कहीं वो मेरा ही अरमान तो कम्बख़्त न था।

लिखी थी जिस पे विधाता ने दास्तां सुख की
मेरी किताब में वो पेज ही पैबस्त न था।

जो ज़ुल्म सह के भी चुप रह गया, न खौल उठा
वो और कुछ हो मगर आदमी का रक्त न था।

उन्हीं फकीरों ने बदली है वक्त की धारा
कि जिनके पास ख़ुद अपने लिए भी वक्त न था।

शराब करके पिया उसने ज़हर जीवन-भर
हमारे शहर में नीरज-सा कोई मस्त न था।

(पाठ-भेद)
दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था
तुम्हारे घर का सफर इस कदर तो सख्त न था

इतने मसरूफ थे हम जाने की तैयारी में
खड़े थे तुम और तुम्हें देखने का वक्त न था

मैं जिसकी खोज में खुद खो गया था मेले में
कहीं वो मेरा ही अहसास तो कम्बख्त ना था

जो जुल्म सह के भी चुप रह गया ना खौला था
वो और कुछ हो मगर आदमी का रक्त न था

उन्हीं फकीरों ने इतिहास बनाया है यहां
जिन पे इतिहास को लिखने के लिये वक्त न था

शराब कर के पिया उसने जहर जीवन भर
हमारे शहर में ‘नीरज’ सा कोई मस्त न था

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