किस हरफ़ पे तूने गोशा-ए-लब ऐ जाने-जहां ग़म्माज किया-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz 

किस हरफ़ पे तूने गोशा-ए-लब ऐ जाने-जहां ग़म्माज किया-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

किस हरफ़ पे तूने गोशा-ए-लब ऐ जाने-जहां ग़म्माज किया
ऐलाने-जुनूं दिलवालों ने अबके ब-हज़ार अन्दाज़ किया

सौ पैकां थे पैवसते-गुलू जब छेड़ी शौक की लय हमने
सौ तीर तराज़ू थे दिल में जब हमने रकस आग़ाज़ किया

बे हिरसो-हवा बे ख़ौफ़ो-ख़तर, इस हाथ पे सिर उस कफ़ पे जिगर
यूं कू-ए-सनम में वक़्ते- सफ़र नज़्ज़ारा-ए-बामेनाज़ किया

जिस ख़ाक में मिलकर ख़ाक हुए वो सुरमा-ए-चश्मे-ख़लक बनी
जिस ख़ार पे हमने ख़ूं छिड़का, हमरंगे-गुले-तन्नाज़ किया

लो वसल की सायत आ पहुंची, फिर हुकमे-हुज़ूरी पर हमने
आंखों के दरीचे बन्द किये, और सीने का दर वाज़ किया

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