किस्सा रूपारानी-बिन गाये भी तुमको गाया -कुमार विश्वास-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Vishwas 

किस्सा रूपारानी-बिन गाये भी तुमको गाया -कुमार विश्वास-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Vishwas

रूपा रानी बड़ी सयानी;
मृगनयनी लौनी छवि वाली,
मधुरिम वचना भोली-भाली;
भरी-भरी पर खाली-खाली।

छोटे कस्बे में रहती थी;
जो गुनती थी सो कहती थी,
दिन भर घर के बासन मलती;
रातों मे दर्पण को छलती।

यों तो सब कुछ ठीक-ठाक था;
फिर भी वो उदास सी रहती,
उनकी काजल आंजी आँखें
सूनेपन की बातें कहती।

जगने उठने में सोने में
कुछ हंसने में कुछ रोने में
थोड़े दिन यूँ ही बीते
खाली खाली रीते रीते

तभी हमारे कवि जी,
तीन लोक से न्यारे कवि जी,
उनके सपनों में आ छाए;
उनको बहुत-बहुत ही भाए।

यूं तो लोगों की नज़रों में
कवि जी कस्बे का कबाड़ थे,
लेकिन उनके ऊपर नीचे
सच्चे झूठे कुछ जुगाड़ थे।

बरस दो बरस में टीवी पर
उनका चेहरा दिख जाता था;
कभी कभी अखबारों में भी
उनका लिखा छप जाता था।

तब वह दुगने हो जाते थे;
सबसे कहते बहुत व्यस्त हूँ,
मरने तक की फुर्सत कब है;
भाग-दौड़ में बड़ा तृस्त हूँ।

रूपा रानी को वो भाए;
उनको रूपा रानी भाई,
जैसे गंगा मैया एक दिन
ऋषिकेष से भू पर आई।

धरती को आकाश मिल गया;
पतझड़ को वनवास मिल गया,
पीड़ा ने निर्वासन पाया;
आँसू को वनवास मिल गया।

रूपा रानी के अधरों पर
चन्दनवन महकाते कवि जी,
कभी फैलते कभी सिमटते;
देर रात घर आते कवि जी।

सोते तो उनके सपनों में
रूपा रानी जगती रहती,
लाख छुपाते सबसे लेकिन;
आँखें मन की बातें कहती।

लेकिन एक दिन हुआ वही
जो पहले से होता आया है,
हंसने वाला हंसने बैठा;
रोया जो रोता आया है।

जैसे राम कथा में
निर्वासन प्रसंग आ जाए,
या फिर हँसते नीलगगन में
श्यामल मेघों का दल छाए।

इसी भांति इस प्रेम कथा में
अपराधी बन आई कविता,
होठों की स्मृत रेखा पर,
धूम्ररेख बन छाई कविता।

रूपा रानी के घरवाले
सबसे कहते हमसे कहते,
यह आवारा काम-धाम कुछ
करता तो हम चुप हो सहते।

बड़ी बैंक का बड़ी रैंक का
एक सुदर्शन दूल्हा आया,
जैसे कोई बीमा वाला
गारंटेड खुशियाँ घर लाया।

शादी की इस धूम-धाम में
अपने कवि जी बहुत व्यस्त थे,
अंदर-अंदर एकाकी थे
बाहर-बाहर बहुत मस्त थे।

बिदा हुई तो खुद ही उसको
दूल्हे जी के पास बिठाया।

तब से कवि जी के अंतस में
पीड़ा जमकर रहती है जी,
लाख छिपाते बातें लेकिन
आँखें सब से कहती हैं जी।

आप पूछते हैं यह किस्सा
कैसे कब और कहाँ हुआ था,
मुझको अब कुछ याद नहीं
इसने मुझको कहाँ छूआ था।

शायद जबसे वाल्मीकि ने
पहली कविता लिखी तबसे,
या जब तुलसी रतनावली के
द्वारे से लौटे थे तब से।

यूं ही सुना दिया यह किस्सा
इसमें कुछ फरियाद नहीं है,
आगे की घटनाएँ सब
मालूम हैं पर याद नहीं है।

मर गया राजा मर गयी रानी
खतम हुई यूं प्रेम कहानी।

बाकी किस्से फिर सुन लेना
आएंगी अनगिनत शाम जी,
अच्छा जी अब चलता हूँ मैं,
राम-राम जी राम-राम जी।

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