किसी से छूट के शाद किसे से मिल के ग़मीं-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

किसी से छूट के शाद किसे से मिल के ग़मीं-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

किसी से छूट के शाद किसे से मिल के ग़मीं
फ़िराक़ तेरी मोहब्बत का कोई ठीक नहीं

युं-ही-सा था कोई जिसने मुझे मिटा डाला
न कोई नूर का पुतला न कोई ज़ोहरा-जबीं

जो भूलतीं भी नहीं याद भी नहीं आतीं
तेरी निगाह ने क्यों वो कहानियां न कहीं

लबे-निगार है या नग़्मा-ए-बहार की लौ
सुकूते-याद है या कोई मुतरिबे-रंगीं

शुरू-ए-ज़िन्दगी-ए-इशक का वो पहला ख़्वाब
तुम्हें भी भूल चुका है मुझे भी याद नहीं

हज़ार शुक्र कि मायूस कर दिया तूने
ये और बात कि तुझसे बड़ी उमीदें थीं

अगर बदल न दिया आदमी ने दुनियाँ को,
तो जान लो कि यहाँ आदमी कि खैर नहीं

हर इन्किलाब के बाद आदमी समझता है,
कि इसके बाद न फिर लेगी करवटें ये ज़मीं

बहुत न बेकसी-ए-इश्क़ पर कोई रोये,
कि हुस्न का भी ज़माने में कोई दोस्त नहीं

अगर तलाश करें,क्या नहीं है दुनियाँ में,
जुज़ एक ज़िन्दगी कि तरह ज़िन्दगी कि नहीं

हुनर तो हुनर ऐब से भी जलते हैं
फ़ुग़ाँ कि अहले-ज़माना है किस कदर कमबीं

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