किसान-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

किसान-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

एक उमर गुज़ारी है उसने
एक वक़्त सा है बीता वो
कतरा कतरा मोम हुआ
ऐसे लम्हा लम्हा जीता वो।।

बारिश में भीगा करता है
पूस में पूरा ठिठुरा वो
गर्मी की लू में जला किया
ऐसे लम्हा लम्हा जीता वो।।

भूखा भी सो जाता है
कर्जे में पूरा डूबा वो
गाली थप्पड़ है मिला किया
ऐसे लम्हा लम्हा जीता वो।।

दहलीज से उठती डोली में
उसने बेटी को विदा किया
ना जाने कैसे – कैसे उसने
दहेज़ भी सारा अदा किया।।

डोली में उठती बेटी से
इक और उधार में डूबा वो
कर्जे में पुश्तें जिया किया
ऐसे लम्हा लम्हा जीता वो।।

खेत दरार से भरा हुआ
और माथ पकड़ के रोता वो
भगवान् भी मानो पत्थर हों
बेकार में बीजें बोता वो।।

पिछले साल के कर्जे हैं
क्या होगा ये ही रोता वो
चिंता में रातें जगा किया
ऐसे लम्हा लम्हा जीता वो।।

साँसे रब से मिलती हैं
और सबको भोजन देता वो
किसान है अपने भुजबल से
मिट्टी को सोना करता वो।।

मटमैले कपड़ों के अंदर
मेहनतकश काया रखता वो
खेतों में घाम बहा किया
ऐसे लम्हा लम्हा जीता वो।।

खून-पसीने का खाता है
श्रम की नींद सोता वो
पूरा जीवन खेतों में रहा किया
ऐसे लम्हा लम्हा जीता वो।।

 

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