किरपा करहु दीन के दाते-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

किरपा करहु दीन के दाते-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

किरपा करहु दीन के दाते मेरा गुणु अवगणु न बीचारहु कोई ॥
माटी का किआ धोपै सुआमी माणस की गति एही ॥१॥
मेरे मन सतिगुरु सेवि सुखु होई ॥
जो इछहु सोई फलु पावहु फिरि दूखु न विआपै कोई ॥१॥ रहाउ ॥
काचे भाडे साजि निवाजे अंतरि जोति समाई ॥
जैसा लिखतु लिखिआ धुरि करतै हम तैसी किरति कमाई ॥२॥
मनु तनु थापि कीआ सभु अपना एहो आवण जाणा ॥
जिनि दीआ सो चिति न आवै मोहि अंधु लपटाणा ॥3॥
जिनि कीआ सोई प्रभु जाणै हरि का महलु अपारा ॥
भगति करी हरि के गुण गावा नानक दासु तुमारा ॥4॥1॥882॥

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