किये आरजू से पैमां, जो मआल तक न पहुंचे-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz 

किये आरजू से पैमां, जो मआल तक न पहुंचे-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

किये आरजू से पैमां, जो मआल तक न पहुंचे
शबो-रोज़े-आशनाई, महो-साल तक न पहुंचे

वो नज़र बहम न पहुंची कि मुहीते-हुस्न करते
तिरी दीद के वसीले ख़द्दो-ख़ाल तक न पहुंचे

वही चश्मा-ए-बका था, जिसे सब सुराब समझे
वही ख़वाब मोतबर थे, जो ख़्याल तक न पहुंचे

तिरा लुत्फ़ वजहे-तसकीं, न करारे-शरहे-ग़म से
कि हैं दिल में वह गिले भी, जो मलाल तक न पहुंचे

कोई यार यां से गुज़रा, कोई होश से न गुज़रा
ये नदीमे-यक-दो-साग़र, मिरे हाल तक न पहुंचे

चलो ‘फ़ैज़’ दिल जलायें, करें फिर से अरज़े-जानां
वो सुख़न जो लब तक आये, पै सवाल तक न पहुंचे

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