किधर गए असवार-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

किधर गए असवार-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

जिनको था भ्रम भुलेखा,
हम हैं वक़्त पर सवार
वक़्त हमसे पूछ कर चलता,
बहती है दरिया की धार।

वृक्षों के पात हिलाएं हम।
भ्रम सृजते, बड़के दावेदार।
कहते थे जो बाँध बिठाएँ
धरती, सूरज, आग औ’ पानी
पवन को गाँठे मार।
किधर गए असवार।

कहाँ गया रौनक मेला
सफ़र सवारी जगत झमेला।
एक ही भाव गुरु और चेला।
तहख़ानों में दुबके सारे
भीतर से बंद कर द्वार।
किधर गए असवार।

बस से पूछते चारों पहिए।
बिन घूमे कैसे बेकाम के रहिए।
इस मौसम को बता क्या कहिए।
कहर कोरोने ने साँस सुखाए,
किस तरह ब्रेकें मार।
किधर गए असवार।

यह बात मेरी पल्ले बाँधना।
बाकी चाहे एक न मानना।
सब्र से संकट को टालना।
कष्ट घड़ी भर है धरती पर,
दिल न जाना हार।
कष्ट परखता सदा शूरता
सिर पर रख कर तलवार।

 

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