किआ तू सोचहि किआ तू चितवहि-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

किआ तू सोचहि किआ तू चितवहि-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

किआ तू सोचहि किआ तू चितवहि किआ तूं करहि उपाए ॥
ता कउ कहहु परवाह काहू की जिह गोपाल सहाए ॥१॥
बरसै मेघु सखी घरि पाहुन आए ॥
मोहि दीन क्रिपा निधि ठाकुर नव निधि नामि समाए ॥१॥ रहाउ ॥
अनिक प्रकार भोजन बहु कीए बहु बिंजन मिसटाए ॥
करी पाकसाल सोच पवित्रा हुणि लावहु भोगु हरि राए ॥२॥
दुसट बिदारे साजन रहसे इहि मंदिर घर अपनाए ॥
जउ ग्रिहि लालु रंगीओ आइआ तउ मै सभि सुख पाए ॥३॥
संत सभा ओट गुर पूरे धुरि मसतकि लेखु लिखाए ॥
जन नानक कंतु रंगीला पाइआ फिरि दूखु न लागै आए ॥4॥1॥1266॥

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